ईमानदार पहल की दरकार

Updated: May 30, 2025
ईमानदार पहल की दरकार
हाल ही में बक्सर जिले के अन्दर हुये नक्सलवादी हमले में देश को एक बड़े राजनेता से हाथ धोना पड़ा, हालांकि यह कोई पहली बार नहीं है, जो नक्सलियों ने सारी व्यवस्था को ठंेगा दिखाकर यह साबित करने का प्रयास किया कि हम जो चाहे, जब चाहे करेगें।
केन्द्र सरकार ने जब से नक्सलवादियों के खिलाफ ‘आॅपरेशन ग्रीनहंट’ का एलान किया, यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस के केंद्र में आ गया है। ‘आॅपरेशन ग्रीनहंट’ से यह संकेत गया है कि सरकार ताकत के दम पर इस मसले को हल करना चहती हैै। लेकिन सरकार के पास नक्सलवादियांे से बातचीत का विकल्प भी है बशर्ते वे हिंसा छोड़ दें। नक्सलवादी नेता मीड़िया के सामने सरकार की इस शर्त को मानने से इनकार कर चुके हैं। अब यह माना जा रहा है कि शांति वार्ता का सिर्फ स्वांग रचा जा रहा था। वास्तब में दोनों पक्षो में से कोई भी इसे लेकर गंभीर नहीं था। दरअसल नक्सलवादियों के प्रभाव-क्षेत्र वाले इलाके खनिज संपदा से भरे हुए है। वहां ज्यादातर गरीब आदिवासी रहते हैं। पिछले छह दशकों में विकास योजनांए वहां नहीं के बराबर पहॅूंची है नक्सलवादियों ने पिछले वर्षो में इस मसले को उठाकर आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बनाई है। व्यवस्थागत उपेक्षा के बीच नक्लसवादियों से मिली सहानुभूति के कारण आदिवासी उनके करीब हुए है।
उदारीकरण के इस दौर में विकास की जो योजनाएं लागू की जा रही हैं उसके लिए आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से हटाया जा रहा है। सरकार जानती है कि हथियारबंद नक्सलवादी उसकी इन योजनाओं में रोड़े का काम करेंगें। वे खुद तो लड़ेगें ही आदिवासियों को भी भड़काएंगें। उधर प्रतिक्रिया स्वयं देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में पिछले दिनों हिंसा में जो तेजी आई है उससे नक्सलवादियांे के खिलाफ भी एक माहौल बना है। सरकार नक्सलवादियों से हिसा और हथियार छोड़ने का आवहान कर रही हैे जबकि नक्सली ये दोनों नहीं छोड़ना चाहते है क्योंकि इसके बाद वे बारगेन करने की स्थिति मंे नहीं होेंगे।
सरकार नक्सलवादियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताती है। नक्सलियों ने भी अपने तौर-तरीके में बदलाव नहीं किए तो वह दिन दूर नहीं है जब जनता भी इस सरकारी राय से इत्तफाक रखने लगेगी। वैसे भी नागरिक समाज मत नक्सलवादियों के प्रति जो सहानुभूति का भाव पहले दिखता था वह धीरे धीरे कम होता जा रहा है। कुछेक मानवाधिकार कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, लेखक और पत्रकार जो नक्सलवादियेां के प्रति उदारता का भाव रखते रहे हैं नक्सल विरोधी आॅपरेशन के इस दौर में उन्हें निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। क्योंकि वे कालांतर में सरकार और नक्सलवादियों के बीच बातचीत के सेतु का काम कर सकते हैं।
नक्सलवादियों से तमाम असहमति रखते हुए भी यह कहना जरूरी है कि उनसे निपटने का वह तरीका मुफीद नहीं होगा जो आंतकवादियों और दूसरे तरह के संगठित अपराधों से निपटने के लिए आजमाया जाता है। वे भटके हुए भले ही हों लेकिन वे इस धरती के बेटे हैं। साथ ही उन्हें इस बात का श्रेय जाता ही है कि उन्होनंे विकास के इस उत्तर आधुनिक दौर में आदिवासियों और गरीब-गरबों के पिछड़ेपन को मुद्दा बनाने में अहम योगदान दिया है।
नक्सलवाद का पेचीदा मुद्दा है। एक तरफ जहां नक्सलवादी इस देश की सेना और पुलिस से पार नहीं पा सकते, वहीं सरकार भी सिर्फ हथियारों के दम पर नक्सलियों को नही मिटा सकती। इन दोनों पक्षांे को यह सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए कि मौजूदा दौर मंे इस समस्या का समाधान बातचीत से ही संभव हैं। लेकिन इसकी पहल कौन करेगा बीच मे ऐसी परिस्थितियां बन रहीं थीं लेकिन दोनों पक्षों के अड़ियल रवैये ने पूरे मामले पर पानी फेर दिया। लेकिन एक बार फिर ऐसी पहल की दरकार है।
अब समय आ गया है कि सभी राजनैतिक पार्टियों को गंभीरता से इस विषय पर विचार करना होगा कि इस समस्या का समाधान दलगत राजनीति से उपर उठकर करना पड़ेगा और यह कोई असम्भव कार्य नहीं है, मुझे विश्वास है कि ईमानदार राजनीतिक पहल इस समस्या को सुलझानें में कारगर सिद्ध होगी और नक्सलियांे को देश की मुख्य धारा से जोड़ने में भी कारगर होगी।
शरद गोयल




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