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कहीं बीमारों की मंडी न बन जाये भारत

Writer: शरद गोयल
शरद गोयल
May 20, 2015
4 min read

Updated: May 31, 2025


अभी 16 मई 2015 को देश के समाचार पत्रों में एक समाचार प्रकाश में आया कि उत्तर प्रदेश के लगभग एक दर्जन से अधिक शहरों से मैगी के सैम्पल एकत्रित किये गये। प्रारंभिक जांच में ही इस उत्पाद में मोनो सोडियम ग्लूटामेट ;डण्ैण्ळण्द्ध स्वीकार मात्रा से अधिक पायी गयी है। खाद्य वस्तु-विशेषज्ञों के अनुसार आवश्यकता से अधिक मात्रा में मोनो सोडियम ग्लूटामेट स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। तथा ये वर्तमान बाजार में पायी गयी मैगी में आवश्यकता से 17वां भाग अधिक है।


अतः उत्तर प्रदेश सरकार के फूड सिक्यूरिटी एण्ड ड्रग एडमिनिस्टेªशन ने केंद्र सरकार के फूड सेफटी एण्ड स्टेंडर्ड ओथोरिटी आॅफ इंडिया को लिखा कि मेगी उत्पाद के देश भर से सेम्पल एकत्रित किये जायें। उत्तर प्रदेश में 2,00,000 पैकेट पकड़े गये हैं, जिन्हें बाजार से वापिस करने के लिये कहा गया है। समाचार पत्रों में तो यहां तक समाचार प्रकाशित किया गया है कि राज्य की सम्बन्धित ऐजेंसी ने केन्द्र सरकार की संबंधित ऐजेंसी को उत्पादन कत्र्ता कम्पनी का लाइसेंस रद्द किये जाने के लिये लिखा है।


मेगी उत्पादन कत्र्ता संस्थान नेस्टले है। यही एक 22 मई 2015 को टाइम्स औफ इंडिया में प्रकाशित समाचार का उल्लेख करना तनिक आवश्यक प्रतीत होता है। समाचार है कि इंटरनेशनल फूड एण्ड बे्रवरीज ऐलाइन्स के मेल से पता चलता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को निजी क्षेत्र की कम्पनियां जिन में कोका कोला , पेप्सी , मेक डोनल , यूनीलीवर और नेस्टले शामिल हैं, विश्व में खाद्य संबंधी मानक और नियम तय करने में प्रभावित करती है। इसी समाचार में आगे लिखा है कि विश्व के अनेक देशों की 45 सिविल सोसाइटी संगठनों ने विश्व स्वास्थ्य ऐसेम्बली को लिखकर आगाह किया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्वतंत्रता, प्रमाणिकता, लोकतंत्रिकता को सुरक्षित बनाये रखने के लिये इस संगठन को स्वार्थी प्रभावों से मुक्त रखा जाये।


दो लाख मेगी के पैकटों को बाजार से वापिस लेने के आदेश पर मेगी निर्माता संस्थान नेस्टले ने भारी आपत्ति और नाराजगी जाहिर की तो उधर केन्द्र सरकार के तहत फूड सेफटी एण्ड स्टेंडर्ड ओथोरिटी औफ इंडिया के उच्च अधिकारी ने कह दिया कि मामला संगीन और संवेदनशील है। एक ओर बच्चों का प्रिय पसंद उत्पाद है तो दूसरी ओर स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने जाने की बात है। अतः गंभीर मामले की और आगे जांच होगी। परिणाम आने पर ही आगे कार्यवाही संभव है। पर प्राथमिकता तो होनी चाहिये कि उत्पादन को तत्काल स्थगित किया जाये और जांच शुरू की जाये। परिणाम आने तक का इंतजार नहीं चाहिये। विचार करें क्या यह निर्णय जन हितैषी है ? एक ओर पसंद तथा दूसरी ओर स्वास्थ्य को हानि। क्या तराजू में स्वास्थ्य को हानि वाले पलड़े को हल्का या समान स्तर पर लाकर निर्णय करना उचित ठहराया जा सकता है ? मैं समझता हूं कि बदलाव के लिये काम करने वाली सरकार इस निर्णय को कदापि स्वीकार नहीं करेगी। गत वर्ष 2013-2014 में 72,200 खाद्य उत्पादों के सेम्पल एकत्रित किये गये जिनमें 13,571 उत्पाद मिलावटी मिले। किन्तु सरकारी कार्यवाही का परिणाम गंभीर प्रभाव डालने में असमर्थ रहा। तभी आज भी मिलावट के कारोबार से समाज जूझ रहा है। आज देश में जंक फूड का कारोबार विदेशी कम्पनियों के बलबूते बढ़ता जा रहा है। समय-समय पर इन उत्पादों के नाम पर लीपा पोती के उतरों ने आम आदमियों को राहत नहीं दी और न अभी भी वह संकट से मुक्त हुआ।


पर आपत्तिजनक टिप्पणियां समाज में देखी जाती हैं परंतु खाद्य-सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 में जंक फूड की कोई परिभाषा नहीं की गयी है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद हैदराबाद ने जंक फूड के प्रतिकूल प्रभावों का मानव देह पर उल्लेख किया है किन्तु प्रशासन मोन क्यों है? क्या इसलिये इस कारोबार में विदेशी संस्थान लगे हैं, विदेशी पूंजी कार्यरत है।


यह कोई पहला मौका नहीं है कि मैगी जैसी शिकायत सरकार व आम लोगों के सामने आयी है। इससे पहले भी बहुत सी बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पादों व उनके अंदर पाये जाने वाले रसायनों पर विवाद हुआ हो, इससे पहले भी कोका कोला पर, मेक डोनल, के एफ सी आदि कम्पनियों के उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल उठे हैं और जमकर विवाद हुआ है फिर क्या कारण है कि सरकार इन कम्पनियों के उत्पादों के लिये उचित व कड़े मानदंडों का उपयोग क्यों नहीं करती है ? एक सूचना के अनुसार लगभग 100 से अधिक इस प्रकार की जीवन रक्षक दवाइयां हैं जो विश्व के उन्नत देशों में पूरी तरह प्रतिबंधित है। और भारत में उनका इस्तेमाल खुले आम धड़ल्ले से किया जाता है। भारत को बीमारों की मंडी बनाने के लिये कहीं बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियों की यह कोई साजिश तो नहीं।


इसी प्रकार एक अन्य क्षेत्र देश में फल फूल रहा है। जहां प्रशासन के मोन और निजी क्षेत्र के स्वार्थी तत्वों की विशेष सक्रीयता से देश के आम आदमी पर शिकंजा कसा हुआ है। विज्ञापन का कारोबार गत 20 वर्षों से तेजी से बड़ा है। भ्रामक और अश्लील विज्ञापन आज आम बात है। इलैक्ट्रोनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया दोनों एक दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश में है। प्रशासन एक अनुभवी और निष्कृय व्यवस्था थोंप कर अपना कत्र्तव्य पूरा मान रहा है। संसद में इस बारे में मामला गत वर्ष उठा तो पाया गया भ्रमिक व अश्लील विज्ञापनों का बोलबाला है। रेगूलेटरी अथोरिटी ने टी.वी.चैनलों पर एक घंटे में 12 मिन्ट विज्ञापन दिखाने की सलाह दी है परंतु इस सलाह को लागू करने की गत एक दो वर्ष में 5050 मामले भ्रमिक विज्ञापन की शिकायतों के सरकार के सामने लायेंगे पर कार्यवाही की चिन्ता न सरकार को है न टी.वी. चैनल के मालिकों को और न ही रेगूलेटरी ओथोरिटी को अब रही। आखिर इन त्रिकोणी व्यूह में फंस कर हानि तो देश का आम आदमी उठा रहा ह। दुर्भाग्य तोे यह है कि जाने में या अनजाने में यह सबकुछ उस सरकार के काल में चल रहा है, जिसने आम आदमी को कुचक्रों से बाहर निकाल कर स्वच्छ वायु में सांस लेने का वायदा किया है। मैं चाहता हूं कि उपलब्धियों का बयान हो। यह आवश्यक भी है परंतु न किये जाने वाले पक्ष पर भी नजर जानी चाहिये क्योंकि साफ स्पष्ट होता है कि प्रशासन का मौन और प्रभावी तत्वों का प्रभाव अपने हितों को साधने के लिये चक्र गढ़ते हैं और आम आदमी के हितों के बलिदान का लाभ उठाते हैं। जरूरत है चहुमुखी प्रतिभा से सक्रीय होने की। बेजा लाभ पाने वाले पर रोक और असहाय की सहायता इस मंत्र को साकार करना है। बस यही तो आम आदमी की अपेक्षा है।

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