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कहीं हो तो नहीं गयी ‘‘स्वच्छ भारत अभियान की पहली बरसी

Writer: शरद गोयल
शरद गोयल
Oct 2, 2015
5 min read

Updated: May 31, 2025


26 मार्च 2014 को लोकसभा में अपार बहुमत के साथ माननीय मोदी जी ने केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की और सवा सौ करोड़ देशवासियों के दिल में एक बदलाव की उम्मीद जागी। आखिर ऐसा होना तो था ही क्योंकि नरेन्द्र मोदी जी ने जो मुददे देश के सामने रखे थे, वे बहुत ही गंभीर मुददे थे। इसी कड़ी में 2 अक्तूबर 2014 को मोदी जी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत का जो आहवान किया तो देश में एक अजीब सी उर्जा की लहर दौड़ गयी। देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि 2 अक्टूबर के दिन सभी सरकारी कार्यालय, बैंक, सार्वजनिक संस्थान खोले गये व जी एम से लेकर चपरासी, सी ई ओ से लेकर क्लर्क तक, मंत्री से लेकर कार्पोरेटर तक, पार्टी अध्यक्ष से लेकर आम कार्यकत्र्ता तक, पैसे वाले से लेकर गरीब नागरिक तक सभी ने अपने हाथों में झाड़ू ले ली और निकल पड़े मोदी जी के सपने को साकार करने में अपना सहयोग करने के लिये। मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक जितने भी मुददे उठाये हैं मेरा मानना है कि स्वच्छ भारत का मुददा महत्त्वपूर्ण व संवेदनशील है। 2 अक्टूबर 2014 के एक महीने तक तो ऐसा लगने लगा कि देश का हर आदमी मानो आजादी की जंग की तरह गंदगी की इस जंग से लड़ने निकल पड़ा और मन में ऐसा ख्याल आता था कि यदि ऐसा ही चला तो वह दिन दूर नहीं कि भारत की गिनती भी दुनिया के स्वच्छ देशों की श्रेणी में होगी। लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता यह सपना चूर-चूर होता दिखाई दिया और स्वच्छ भारत अभियान नेताओं द्वारा झाड़ू लेकर अखबार व टी वी फोटो खिंचवाने मात्र तक रह गया। गंभीरता से सोचने का विषय है कि ऐसा क्यों हुआ पर जब मैं इन्हीं भारतीयों को विदेशों में देखता हूं तो पाता हूं कि ये भारतीय विदेशियों से भी ज्यादा अनुशासन में रहते हैं तो यह बात बिल्कुल गले नहीं उतरती। तो कमी दूसरे पक्ष पर है और वह है इन्फ्रास्ट्रक्चर। मोदी जी द्वारा शुरू किये गये इस अभियान से एक बात तो हुयी कि छोटा बच्चा हो या बड़ा सबके दिल में सफाई के प्रति जागरूकता आयी और यहां तक छोटे बच्चों ने भी चलती कार से कूड़ा फेंकने से परहेज किया। कमोवेश ऐसी स्थिति पूरे देश में पायी गयी लेकिन इसका दूसरा पहलू यह था कि इस कचरे व कूड़े का निस्तारण करने के लिये स्थानीय ऐजेंसियां तैयार होनी थीं और उन्होंने अपनी कार्यक्षमता को नहीं बढ़ाया। कारणवश लोग निरूत्साहित हो गये और कचरे को जहां तहां डालना शुरू कर दिया। स्थानीय को भी साथ-साथ अन्य सारे कार्यों से ऊपर इस कार्य को समझ कर इस कचरे के निस्तारण की योजना बनानी चाहिये थी। आज देश की राजधानी दिल्ली में जो कचरे की स्थिति है उस पर गंभीर योजना बनाना तो दूर बल्कि यह सर्वे भी नहीं किया गया कि कितना कचरा कहां कहां से आता है और उनका निस्तारण किन-किन क्षेत्रों में हो सकता है। एक जानकारी के माध्यम से पता चला कि कंस्ट्रक्शन का मलबा दिल्ली में प्रतिदिन 4000 टन निकलता है। हम इसका उपयोग ठीक से करके इसको दोबारा से प्रयोग कर सकते हैं और चीन ने इसे सफलतापूर्वक किया है। तथा इस मलबे से हजारों किलोमीटर लम्बी सड़कें बनायी हैं।

पिछले साल सरकार ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि स्वच्छ भारत अभियान के लिये 68000 करोड़ रूप्ये की आवश्यकता है किन्तु केन्द्र सरकार केवल 14000 करोड़ रूपये देगी। देश में 4000 से अधिक छोटे बड़े शहरी इलाके हैं। जिनके कूड़े को रिसाइकल करने के लिये 68000 करोड़ रूप्ये की आवश्यकता है जिसमें केंद्र सरकार तो केवल 14000 करोड़ ही उपलब्ध कराऐगी बाकी की राशि राज्य सरकार व प्राइवेट सैक्टर देगा। 94प्रतिशत लोगों का कहना है कि इसमें पालिसी मेकिंग सुधार की आवश्यकता है।


भारत में इस अभियान के चलने के बाद भी 72 प्रतिशत म्युनिसिपालिटी का काम संतोषजनक नहीं है। देश में जो पब्लिक टायलेट हैं उनके उपयोग के विषय में सर्वे कहता है कि 76 प्रतिशत का उपयोग ठीक नहीं हो रहा है ,इस का कारण है रखरखाव की कमी।


94 प्रतिशत लोगों का कहना है कि इस स्वच्छता अभियान में नीति निर्माण के स्तर पर ही व्यापक सुधार की आवश्यकता है। देश में 13 राज्य और केन्द्र शासित प्रदेश ने ही भारत सरकार का इस अभियान के अंतर्गत जो आबंटित राशि का उपयोग किया है वह है-


बिहार-37‐7 करोड़, झारखण्ड-16‐27 करोड़, केरल-19‐8 करोड़,पश्चिम बंगाल-64‐01 करोड़, आसाम-0‐2 करोड़, अरूणाचल प्रदेश- 9‐36 करोड़, दमन एंड दीव-0, दादर और नगर हवेली-0, लक्षद्वीप-0, अंडेमान निकोबार-0, मेघालय-4‐05 करोड़, नागालैंड-10‐52 करोड़, ़ित्रपुरा-0


एक साल में 4,17,796 टायलेट बनाने का लक्ष्य था। मेरा मानना है कि इसमें पहल दिल्ली को करनी चाहिये थी क्योंकि यहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। सभी भाजपा शासित प्रदेशों को पहल करनी चाहिये थी। खास तौर पर हरियाणा को इसमें अग्रणी बनना चाहिये था क्योंकि एक तो हरियाणा का बहुत बड़ा हिस्सा एन सी आर का पार्ट है और दूसरा हरियाणा पहली बार अकेले भाजपा की सरकार बनी है। हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल जी को हर जिले में विश्व विद्यालय व मेडिकल कालेज खुलवाने जैसी घोषणाऐं जो कि कभी पूरी नहीं हो सकती करने की बजाय राज्य के कम से कम दिल्ली के सीमावर्ती जिले फरीदाबाद, गुड़गांव, सोनीपत व बहादुरगढ़ को एक ऐसा आदर्श बनाना चाहिये था जिसके बारे में मोदी जी भी सीना तान कर बोलते कि मेरे स्वच्छ भारत अभियान के सपने को हरियाणा सरकार ने पूरी तरह से साकार किया है। यह सब तो दूर इसके उल्ट हरियाणा सरकार हरियाणा का सिरमौर कहलाने वाले गुड़गांव जिले को भी साफ नहीं कर पायी । आज गुड़गांव जिला खासतौर से गुड़गांव शहर हिन्दुसतान का कार्पोरेट हब बना हुआ है और हालत यह है कि पिछले लगभग 3 साल से कचरा ट्रीटमेंट प्लांट बंद पड़ा है और मलबे का तो यह आलम है कि महरौली रोड हो या फरीदाबाद रोड, राष्ट्रीय राजमार्ग हो या कोई और मुख्य रोड, सड़कों के दोनों ओर मलबा देखना गुड़गांव वालों की आदत सी बन गयी है। सारे शहर का आलम देखें तो ऐसी भयानक स्थिति है जो शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। लगभग एक साल बाद भी सार्वजनिक शौचालय व कूड़ेदान नहीं लगाये गये। आम आदमी कूड़ा फेंके तो कहां फेंके। आवश्यकता है बड़े-बड़े वादों को छोड़ कर इस सबसे छोटे व जरूरी काम को सरकार गंभीरता से ले। मुख्यमंत्री जी का दायित्व भी है कि वह प्रधानमंत्री जी के इस सपने को साकार करने का भरसक प्रयास करे और हर जिले में एक उच्च अधिकारी के नेतृत्व में एक स्वच्छ शहर की टीम बने और सफाई के लिये उपयुक्त आधुनिक उपकरण मंगवाये जायें जिससे कम सेे कम मैन पावर लगे और अधिक से अधिक सफाई हो। अन्यथा हर साल 2 अक्टूबर पर आम आदमी इस अभियान की बरसी के रूप में अपने को ठगा हुआ महसूस करेगा।

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