ग्रो इन इंडिया होगा, तभी मेक इन इंडिया बनेगा

Updated: May 31, 2025
देश में वर्ष 2014 बदलाव के लिए वायदों का वर्ष माना जाएगा जिसके तहत एक अभूतपूर्व बदलाव हुआ। यह बदलाव भविष्य के पूरे होने वाले वायदों और भरोसों पर आधारित था। अविश्वास, निराशा और असहायविवशता के माहौल में एक आशा जगी। एक परिवर्तन के लिए भरोसों, आशा और आश्वासनों के आधार पर देश में परिवर्तन की लहर बह निकली थी। परन्तु अब 2015 में इन आश्वासनों और आशाओं को मूर्तरूप देने का समय है। इसी संदर्भ में अभी देश में विकास के लिए एक वातावरण तैयार किया जा रहा है। देश में विकास को दिशा और गति देने के लिए ,आर्थिक जगत की प्रमुख हस्तीयों के लिए सम्मेलनों के आयोजन किए गए। देश व विदेश के उद्योग जगत के प्रसिद्ध प्रमुखों का एकत्रीकरण हुआ। ऐसे एकत्रीकरण इससे पूर्व भी देश में समय-समय पर आयोजित हुए हैं। पूर्व के आयोजनों की ही तरह इस आयोजन में भी विदेशी पूंजी निवेश संबंधी वायदे और भरोसे परोसे गए। सन् 2003से 2014-2015 तक निवेशकों को लुभाने वाले सम्मेलन देश में हुए हैं। अर्थशास्त्री हेमन्त शाह के अनुसार 2003 से 2011 तक के दौरान आयोजित किए गए 5 सम्मेलनों में जो निवेश हेतु भरोसे दिए गए थे उन में से मात्र 7.85 प्रतिशत को ही अमल में लाया गया है।
इसी प्रकार एक और भी उदाहरण है कि सन् 2000 में सरकार ने तय किया कि विनिर्माण क्षेत्र में विस्तार करके रोजगार के नए अवसर बढ़ाये जायें ,देश में पूंजी निवेश बढ़ाया जाये और देश से निर्यात को गति दी जाए। इसके लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र योजना बनाई गई। इस योजना को मूर्तरूप देने के लिए 10 फरवरी 2006 में कानून बना तथा सरकार द्वारा अभी तक 566 विशेष आर्थिक क्षेत्रों को स्वीकृति तो दी गई पर सरकार 388 क्षेत्रों को मान्यता दे पायी परंतु 185 क्षेत्रों में ही कार्य प्रारंभ हुए जो 47.7 प्रतिशत है। इतना ही नहीं सन् 2007 से 2013 तक सरकार द्वारा इस योजना के तहत औद्योगिक इकाइयों को 83,000 करोड़ रूपयों की करों में छूट दी है। भूमि विशेष आर्थिक क्षेत्रों के तहत दी गई थी, उसमें से 53,000 एकड़ भूमि बिना उपयोग अभी भी पड़ी है। रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया के वर्तमान गर्वनर रघुराम जी राजन ने भी सरकार के ’भारत में बनाओ‘ कार्यक्रम के प्रति सावधानी बरतने की बात कही है उनका कहना है कि भले ही विनिर्माण क्षेत्र की सकल घरेलु उत्पाद में 15 प्रतिशत से 25 प्रतिशत भागीदारी बनाने की सरकार की सोच विकास के लिए ठीक है परंतु विनिर्माण विस्तार के लिए विश्व मांग का आधार बनाने के स्थान पर भी स्वदेशी मांग को आधार बनाना होगा। भले ही चीन, कोरिया , ताइवान, आयरलैंड मैक्सिको ने एस. इ. जेड. योजना के माध्यम से सफलता पाई है परंतु भारत में तो यह योजना पूरी तरह से विफल हुई है।
’भारत में बनाओ‘;डंाम प्द प्दकपंद्ध के स्थान पर देश में उत्पाद उगाओ को तरजीह देनी होगी। उत्पाद बनाओ की नीति गत वर्षों में किये गये अनेकों प्रयासों के बावजूद सफल नहीं हो पायी है और खेद है कि इस असफलता से कोई सबक भी नहीं लिया गया। उत्पाद बनाओ की सफलता के लिए सबसे बड़ी बाधा स्वयं सरकार की नीतियां ही हैं। देश में विनिर्माण के लिए कच्चे माल की उपलब्धी सहज और सस्ती नहीं है, उत्पादों को प्रसंस्करण करने के लिए इंधन के साधन बिजली , पैट्रोलियम उत्पाद , कोयला न सहज उपलब्ध होते हैं और न ही तुलनात्मक रूप से सस्ते हैं। उद्योग विस्तार के लिए उपयोग में आने वाली मूलभूत सुविधाएं, सड़क, बंदरगाह, रेलगाड़ी, यातायात के साधन मुक्त बाजार की स्वतंत्र उदारवादी अवधारणा के कारण देश में अनयंत्रित हैं। उन्हें देश में उद्योगों का दर्जा प्राप्त है और इन उद्योगों में लोग भरपूर लाभ अर्जित करना अपना अधिकार समझते हैं। विनिर्माण क्षेत्र के लिए कच्चा माल तेज मिलेगा, इंधन के साधन महंगे होंगे, मूलभूत सुविधाओं के उपयोगकर्Ÿााओं को अधिक भुगतान करना पड़ेगा तो इन हालातों में उत्पादों की कीमतें प्रतिस्पर्धी कैसे रहेंगी? यही कारण है कि देश में 25 वर्ष से नई उदारवादी उद्योग नीति के लागू होने के बावजूद देश से निर्यात, आयात से अधिक नहीं बढ़ पाया है। क्योंकि निर्यात की गयी वस्तुएं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा से बाहर है उनके विक्रय को प्रोत्साहन देने के लिए भारत सरकार को सबसीडी देनी पड़ती है तब कहीं जैसे तैसे उनका विश्व के बाजार में विक्रय होता है।
भारत में राजनैतिक बदलाव की लहर है तो विश्व में पर्यावरण में परिवर्तन की व्यार बह चुकी है। वायुमंडल में ऊष्णता भी सीमा से पार होती जा रही है। इसी ओर कहीं-कहीं ऊष्णता की कमी मानव जीवन के लिए संकटकारी बन चुकी है। इन्हें दैवी आपदा मानना गल्त होगा वरन ये मानव निर्मित गतिविधियों के परिणाम हैं, जंगल समाप्त किये जाते हैं, नदियों में जल प्रदूषित बना दिया गया है, वायुमंडल को विषात्म सुख सुविधाओं को बटोरने के लिए निःसंकोच हो रहा है। इस संबंध में विचार करने पर एक ही तथ्य सामने आता है कि मानव द्वारा विकास के लिए किए जा रहे क्रिया-कलापों के ये परिणाम हैं। भौतिक विकास के लिए उद्योगों की स्थापना हेतु खेती की भूमि का उपयोग आज सामान्य बात है, भूमि से खनिजों का अतिशय दोहन आम हो चुका है। हाल ही में ब्रिटिश स्थित यू.सी.एल. इन्सटीटयूट फाॅर ससटेनेबल रिसोर्स ने अपने अध्ययन के आधार पर एक तथ्य प्रकाशित किया है कि यदि भूमि पर 2 डिग्री सेल्सियस तक ऊष्णता रखने का लक्ष्य प्राप्त करना है तो भूमि के अंदर 80 प्रतिशत कोयला, 50 प्रतिशत गैस और 30 प्रतिशत क्रूड आपको सुरक्षित रखना अनिवार्य है। पर आज इस संबंध में कहीं भी कोई सोच ही नहीं है। सरकार खेती की भूमि को विकास ( औद्योगिक ) के नाम पर किसानों से ले रही है। भला खेती की भूमि जो उत्पादन करती है को मूल्य वृद्धि व गतिविधी उद्योगों के लिए उपयोग में लाना कैसे विकास के लिये हो सकता है, पर भारत में हो रहा है।
वर्ष 1961 में 75.9 प्रतिशत, 2000 वर्ष में 59.9 प्रतिशत और 2012-13 में 49 प्रतिशत देश का श्रमिक वर्ग खेती के कार्यों में कार्यरत था। निरंतर खेती की अनदेखी ने देश के सकल घरेलू उत्पाद में, कृषि की भागीदारी मात्र अब 11 प्रतिशत व 12 प्रतिशत पर ला कर रख दी है। देश में 2004-2005 के दौरान 213 मि.टन अनाज पैदा हुआ है। 2007-2008 से 2010-2011 तक देश में फलों और सब्जियों के उत्पादन में 5 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि रही है। 656 लाखटन से 775 लाखटन फल और सब्जियां 1285 लाखटन से 1496 लाखटन की बढ़ोतरी आंकी गई है। सन् 2006-2007 में किसानों को सरकारी बैंको से दी गयी कुल ऋण राशि की मात्रा 2,29,400 करोड़ रूपये थी जो अभी 7 लाख करोड़ रूपये से अधिक सरकारी तौर पर कही जा रही है।
किन्तु इसके विपरीत हालात यह है कि देश में खेती के कार्य से पलायन बढ़ रहा है। किसान आत्म हत्याएं कर रहे हैं, देश के अन्य प्रदेशों की बात नहीं , पंजाब और हरियाणा जहां खेती एक सक्ष्म और समृद्ध आर्थिक क्षेत्र माना जाता है, में भी किसान आत्म हत्याएं करने के लिए विवश हो रहे हैं। सन् 2000 से 2010 के दौरान पंजाब में 6,128 किसानों ने आत्म हत्याएं की हैं, जिनमें 4686 किसान कर्ज के बोझ के शिकार थे। हरियाणा में 80 प्रतिशत और पंजाब में 89 प्रतिशत किसान कर्ज के बोझ में दबे हैं। यह तथ्य पटियाला यूनिवर्सिटी शोध अन्वेषण विभाग द्वारा किये गये अध्ययन के बाद प्रकाश में आये हैं। देश में सीमान्त किसान और लघु किसान कुल किसानों की संख्या के 83 प्रतिशत हैं जिनके पास अधिकतम भूमि 1.38 हेक्टेयर होती है और इनकी संख्या 10,76,23,999 सरकारी रिपोर्ट में अंाकी गई है। अभी तक सरकारों द्वारा खेती को लाभकारी बनाने के लिए किये गये उपायों का इस वर्ग के किसानों को कोई लाम नहीं पहुंचता क्योंकि इस वर्ग के किसान अपने उत्पादों को बाजार में बेचने की क्षमता ही नहीं रखते। ये तो केवल अपने परिवार के लिए वर्ष भर का अनाज पैदा ही कर पाते हैंै। सरकारें प्रति वर्ष समर्थन मूल्य बढ़ा कर खेती को लाभ पहुंचाने का दावा करती रहती हैं। देश में 2004-2005 से 2011-2012 तक धान और गेहूं का समर्थन मूल्य 5.60 रूपये से 10.80 रूपये और 6.40 रूपये से 12.85 रूपये प्रति किलो हुआ है परंतु इसका लाभ तो केवल 17 प्रतिशत किसान को ही मिला क्योंकि वही अनाज बेचने की सामर्थ रखता है। देश में खेती की उत्पादन लागत पिछले वर्षों में 17 प्रतिशत से 20 प्रतिशत तक वार्षिक बढ़ी है। जबकि एक ओर उत्पादन लागत निरंतर तेजी से बढ़ेगी और इस विक्रय मूल्य का लाभ मिलेगा नहीं तो खेती अलाभकारी बनेगी ही एवं उत्पादक आत्महत्या करने के लिए मजबूर होगा ही।
देश में खेती को लाभकारी बनाने के लिए भूमि की उत्पादकता बढ़ानी होगी।
अभी तक सरकार की ध्यान उत्पादन बढ़ाने पर ही है परंतु जब तक उत्पादकता दर नहीं बढ़ेगी, किसान को लाभ नहीं हो पायेगा। देश में उत्पादकता की दर विश्व की उत्पादकता दर से बहुत कम है। धान भारत में 3,514 म.टन जबकि चीन में 6661 म.टन है। गेहूं भारत में 3000 म.टन प्रति हेक्टेयर है तो यू.के. में 7360 म.टन हेक्टेयर है। इसके साथ ही भारत के अंदर ही जो उत्पादकता की दर में अंतर है उसे समाप्त करना होगा। गेहूं पंजाब में 4,507 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर है तो कर्नाटक में 965 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर। धान पंजाब में 3,828 कि.ग्रा.हेक्टेयर तो बिहार में 1090 कि.ग्रा.। देश में जलवायु और भूमि की उत्पादकता पर शोध कार्य करके, विभिन्न उत्पादों की किस्में खोजने का दायित्व शोध संस्थानों को देना चाहिये ताकि उत्पादकता दर की असमानता समाप्त हो और किसान की आय में बढ़ोतरी हो।
लगभग 2 दशक पूर्व देश में खेती को प्रोत्साहित करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के काल में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने का निर्णय लिया गया। अलग से मंत्रालय की स्थापना की गयी। उदे्श्य था कि किसान अपने उत्पादों को मूल्य वर्धित कर विक्रय करेगा और बढ़ती उत्पादन लागत के नकरात्मक प्रभाव से मुक्त होकर कर्ज के बोझ से निजात पायेगा। परंतु सरकार की नीतियां ही उदे्श्य से फिसल गयीं। देश के बड़े घरानों के साथ विश्व की बहुर्राष्ट्रीय औद्योगिक संस्थाओं को भी इस उद्योग में प्रवेश की अनुमति दे दी गयी और देश के इस उद्योग में लघु उद्योग और सूक्ष्म उद्योग बड़े उद्योगों की प्रतिस्पर्धा में सिमट कर रह गये। उत्पादक किसान वहीं का वहीं जबकि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के मालिक रात दोगुने दिन चैेगुने होते गए। आज देश में खाद्य उत्पादों का कारोबार 7000 करोड़ रूपये पहुंच चुका है। इस उद्योग में 2008-2009 में 27,220 इकाइयां थीं जो 2010-11में 36,838 हो गयी, पूंजी निवेश की मात्रा 1,57,06,611लाख रूपये थी जो बढ़ कर 2,49,28,111 लाख रूपये हो चुकी थी एवं लाभांश की राशि भी अभी 23,62,650 लाख रूपये हो चुकी है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग तो फला फूला पर उत्पादक किसान कर्ज के बोझ से आत्म हत्याएं करने के लिए विवश सरकार की नीतियों के क्रियान्वयन में खामियों के कारण ही निर्धारित उदे्श्य विफल हुआ। जरूरत यह थी कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को केवल कुिटर उद्योग क्षेत्र के लिए सुरक्षित किया जाता। किसान अपने उत्पादों को अपनी क्षमता ,दक्षता और सामार्थ के अनुसार उनका मूल्य वर्धन कर नए उत्पादों को जन्म देता और अपनी आय बढ़ा कर कर्ज से निजात पाता।
देश के कृषि क्षेत्र में पूंजी की कमी को दूर करने की आवश्यकता है। सरकार कृषि क्षेत्र में बैंकों से ऋण राशि की मात्रा 7 लाख करोड़ रूपये करने का दावा करती है परंतु वास्विकता यह है कि कृषि क्षेत्र को सबसे कम ऋण दिया जा रहा है। कृषि क्षेत्र आवश्यकता के अनुसार पूंजी के लिए तरस रहे हैं। अभी हाल ही में रिजर्व बैंक के डिप्टी गर्वनर के अनुसार बैकों से सेवा क्षेत्र को 20.93 प्रतिशत, फुटकर क्षेत्र को 15.4 प्रतिशत, उद्योग क्षेत्र को 46.32 प्रतिशत, अन्य सहायक क्षेत्रों को 3.11 प्रतिशत और खेती को 13.90 प्रतिशत कुल ऋण राशि का कर्ज दिया जा रहा है। देश में मुख्य क्षेत्र खेती है और अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर है। ऋण प्राप्ति में सर्वाधिक भागीदारी कृषि क्षेत्र की होनी चाहिए जिसे सरकार द्वारा अविलम्ब पूरा करना चाहिए, तभी देश में सर्वांगीण विकास की कल्पना साकार हो पायेगी।
सरकार द्वारा हाल ही में शुरू किये गये गंगाा स्वच्छ करने और उसके जल प्रवाह को निर्मल और अविरल बनाने के व स्वच्छ भारत बनाने के अभियानों से खेती को जोड़ना, खेती के विकास में सहायक हो सकता है। गंगा जल प्रवाह को अविरल व निर्मल बनाने के अभियान के तहत देश में जल की उपलब्ध मात्रा की जानकारी यह है कि वार्षिक 1869 वि.क्यू.मी. जल की उपलब्धता सरकारी तौर पर पुष्ट की गयी है जिसमें से जल प्रवाह आदि की आवश्यकता पूरी करने के बाद 1123 वि.क्यू.मी. जल प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रीय एकीकृत जल संसाधन विकास आयोग ने देश में जल भंडारण की क्षमता की जरूरत 458 वि.क्यू.मी. आंकी है जो अभी जल की उपलब्ध मात्रा से लगभग आधे से भी कम है परंतु अभी देश में जल भंडारण की क्षमता मात्र 225 वि.क्यू.मी. है। देश में जल भंडारण क्षमता को आवश्यकता अनुसार मात्रा में बढ़ाकर उपलब्ध जल को भंडारण किया जा सकता है और देश के प्रत्येक खेत को सिंचाई के लिए जल दिया जा सकता है। और इस प्रकार किसान की अनिश्चित वर्षा के जल पर निर्भरता समाप्त हो पायेगी। समय पर फसल को सिंचाई के लिए जल मिलेगा तो फसल बढ़ेगी और किसान आत्म हत्या करने से बचेगा।
सरकारी सूत्रों ने पुष्टी की है कि देश में कुल कितना ठोस कचरा और तरल अपशिष्ट पैदा होता है। इसका आंकलन सरकार के पास नहीं है किन्तु देश के 59 बड़े शहरों में जो अपशिष्ट पैदा होता है उसकी मात्रा 1,33,760 टी.डी.पी. है और इसमें से 25,884 टी.डी.पी. अर्थात लगभग 20ः से कम अपशिष्ट को ही प्रसंस्करण करने की व्यवस्था की क्षमता है। भला क्या इस परिस्कृत करने की व्यवस्था की क्षमता को बढ़ाने की योजना क्रीयान्वयन करने से पूर्व देश में स्वच्छता का अभियान सफल हो सकता है। अभियान का लक्ष्य है कि देश के 4041 कस्बों ,नगरों में पैदा होने वाले शत प्रतिशत अपशिष्ट को एकत्रीकरण कर वैज्ञानिक ढंग से प्रसंस्करण कर पुनः उपयोग योग्य बनाना। और इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए 62,009 करोड़ रूपये की आवश्यकता आंकी गई है जिसमें से 14,623 करोड़ केन्द्र सरकार द्वारा व्यय होना है। शेष व्यय के लिए राज्य सरकार और निजी क्षेत्र पर निर्भरता है। अभी हाल ही में समाचार प्रकाश में आया है कि सरकार इस प्रसंस्करण क्षेत्र को उद्योग का दर्जा देकर निजी क्षेत्र को सौंपने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। वास्तव में देश में पैदा होने वाले अपशिष्ट खेती के लिए खाद और सिंचाई के लिए जल भी उपलब्ध हो सकता है परन्तु यदि इसे उद्योग बनाकर निजी क्षेत्र को दे दिया गया तो यह बड़ी गल्ती होगी, जो देश में विनिर्माण उद्योग के क्षेत्र में कच्चे माल और इंधन के स्त्रोतों को उद्योग का दर्जा देकर गत वर्षों में सरकारांे ने की है। निजी क्षेत्र खाद्य और सिंचाई के जल की आपूर्ति से अपना बेहद मुनाफा कमाने से चूकेगा नहीं और सरकार, मुक्त बाजार में स्वतंत्र उदारीकरण की नीति के कारण निजी संस्थानों को मुनाफाखोरी करने से रोक नहीं पायेगी। किसान वहीं का वहीं रह जाएगा पर देश में उद्योगपतियों को अवश्य एक नया उद्योग का क्षेत्र नये रोजगार देने के नाम पर जरूर धन कमाने के लिए उपलब्ध करा दिया जाएगा।
’देश में बनाओ’ व ’देश में उगाओ’ के मार्गों में बराबर रोड़े हैं और इन्हें दोनों हाथों से बीनना होगा। पर विचारणीय विषय है कि देश में बनाओ पहले या देश में उगाओ पहले । उगाओ पहले कार्यक्रम क्रियान्वयन करने से ही देश में समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचा पाना संभव है। भारत किसानों का देश है यदि खेती के विकास को तरजीह दी गई तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लगभग 80-90 प्रतिशत आबादी का लाभान्वित होना स्वभाविक है। भारत जैसे बहुआबादी वाले देश के लिए देश में उगाओ कार्यक्रम प्रगति के बहुमुखी दरवाजे खेलने के लिए सक्ष्म है पर हां, वे देश जहां आबादी कम है, उन्हंे देश में बनाओ कार्यक्रम लाभ दे सकता है। गत 25 वर्षों से विश्व में जो आर्थिक नीति लागू हुई जिसका अन्धानुकरण भारत जैसे देश में हुआ, उसका परिणाम सामने है और उसे आज स्वयं यूरोपियन देश भोगने के लिये विवश है। इंग्लैंड स्थित गरीबी निवारण सामाजिक संस्था ओक्सफैम ने अपनी हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट में आगाह किया है कि विश्व में गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती जा रही है इसे कम करना अति आवश्यक है अन्यथा इसके दुष्परिणाम भोगने होंगे। क्या भारत को इस चेतावनी के बाद सजग होने की जरूरत नहीं ? जब जगे तभी सवेरा ,अतः विलम्ब के बाद अभी भी जो बदलाव की आशा जगी है, उसे मूर्त रूप में लाया जाये, इसी में देश का और विश्व का भला निहित है।




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