top of page
logo.jpg
  • Facebook

फिर हंगामा है क्यों बरपा

Writer: शरद गोयल
शरद गोयल
Mar 7, 2020
4 min read

Updated: May 31, 2025


हाल ही में प्रर्दशित हुयी आमिर-खान की फिल्म पी.के. पर पूरे देश में हिन्दूवादी संगठन बवाल मचाये हुये है, फिल्म देखने के बाद मुझे ऐसा कुछ नया नहीं नजर आया जिसके लिये बवाल मचाया जाये, सच बात तो यह है कि अब इस देश में बचे-खुचे हिन्दुओं को यह समझ लेना चाहिये कि यदि इस देश में रहना है तो उन्हें अपने देवी देवताओं, धार्मिक चिन्हों, अपनी आस्था से जुड़े हुये संस्थानों व अन्य पशु पक्षी इत्यादि का अपमान व निराशा झेलने की आदत डालनी होगी, यदि यह आदत वह डाल लेगें तो उनके लिये ज्यादा व्यवहरिक है बजाय इसके कि सिनेमाघरों में जाकर उस अपमान को देखना व बनाने वालों को आर्थिक फायदा देना और उन्हें प्रोत्साहित करना कि यदि भविष्य में मोटा पैसा कमाना है तो ऐसी फिल्म बनायी जाये जिसमें प्रत्यक्ष व परोक्ष रुप से हिन्दू धर्म के साथ खिलवाड़ हो और जहां तक सवाल है विरोध का मैं यहां पर आपको बता दूं जिन फिल्मों में इस प्रकार की गतिविधियां होती है, जिनसे हिन्दू धर्म की धार्मिक भावनायें आहत हो उन्हें देखने वाले 80 से 85 प्रतिशत लोग हिन्दू होते है क्योंकि हिन्दू अपने आपको बहुत उदार वादी मानते है इसलिये अधिकतर लोगों का यह मत होगा कि इस फिल्म में बुरा क्या है, यह तो सामान्य सी बात है, ऐसा तो हमारे धर्म में होता ही है, हमारे अधिकतर साधु-संत ऐसे हैं ही, हमारे धार्मिक स्थानों पर इस तरह की बदतमीजियां तो होती ही है, आदि-आदि, दरअसल हिन्दू आदी हो गये है इन सब चीजों के, और उन्हें कुछ बुरा नहीं लगता, यह हिन्दूवादी संगठन जो विरोध का प्रर्दशन कर रहा है, उन्होंने कभी उस दीवार वाले घर के शीशे नहीं तोड़े, जिसकी दीवार की पेशाव से रक्षा करने के लिये देवी देवताओं के चित्र लगाये जाते है, धार्मिक चित्रों और चिन्हों का अपमान हमारे चारों तरफ रोज होता है, और रोज हम उनको देखते है, महाराष्ट्रा में गणपति विसर्जन के बाद के दृश्य हो, या बंगाल में दुर्गा पूजा के बाद माता की प्रतिमाओं का हाल हो, यह सब कुछ हिन्दुओं के लिये कुछ नया नहीं है आय दिन हिन्दुओं द्वारा पूजी जाने वाली गौमाता सड़क की गंदगी खाती हुयी मिलती है, तो इसका विरोध हिन्दूवादी संगठन नहीं करते हैं, यह ठीक है कि फिल्म में दिखाये गये सन्यासी के रुप में एक व्यक्ति का चरित्र चित्रण एक झूठे व मक्कार व्यक्ति के रुप में किया गया है, जिसके उदाहरण आय दिन देखे जा सकते है, शंकर भगवान के रुप में एक व्यक्ति को अजीब सी हरकत में देखा गया, हिन्दू बुद्धिजीवी वर्ग इसको एक धर्म सुधारक के रुप में देख रहा है, मेरा मानना है कि धार्मिक बदलाव व सुधार उस धर्म के धार्मिक सुधारकों की जिम्मेदारी है, और मैं पूछंता हूँ कि फिल्म उद्योग को यह जिम्मेदारी किसने दी, यह क्यों धर्मसुधार के ठेकेदार बने हुये है महीने-दो-महीने में एक ऐसी फिल्म आ जाती है जिसमें हिन्दूधर्म से जुड़ी विवादस्पद बातें होती है, और हिन्दू बढ़-चढ़ कर उस फिल्म को देखते है और निर्माता का काम पूरा हो जाता है, किसी फिल्म में ऐसा कोई दृश्य या पठकथा हो, जिसमें मुस्लिमों की भावना को आहत किया गया हो दिखायी गयी हो मुझे याद नहीं पड़ता।

फिल्म का नाम राम-लीला रखकर उसके अन्दर दुनिया जहां की शर्मनाक चीजें डालना, हिन्दू संन्यासियों को हर फिल्म में फ्रोड़ दिखाना एक तरफ, और दूसरी तरफ यही फिल्म उद्योग समाज में ‘चार बोतल बोड़का काम मेरा रोज का’ जैसे गानों को प्रचलित करता है, यह एक उदाहरण है, मेरा मानना है कि सौ साल पुराने भारतीय फिल्म उद्योग को यदि मैं समाज में फैली हर तथाकथित अश्लील कही जाने वाली चीज के लिये यदि मैं प्रत्यक्ष रुप से जिम्मेदार हूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, अगर धार्मिक कुरीतियों को उजागर करने की बात करें तो मुस्लिम धर्म की कुरीतियों और गलत धारणा के कारण आज पूरा विश्व आतंकवाद के भय में जी रहा है, फिल्म निर्माताओं को धर्म सुधार और समाज सुधार का ठेका यदि लेना है तो वे सभी धर्मों का लें, न कि केवल हिन्दुओं का।

यहां पर सबसे ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि मुसलमानों की वोट के भूखें राजनेताओं ने इस पर भी राजनीति शुरु कर दी बड़ा आश्चर्य हुआ जब पता लगा कि यू.पी. व बिहार में इस फिल्म को कर मुक्त कर दिया गया, अपने को मुसलमानों का हितैषी बताने वाली सरकार कब तक मुसलमानों को इमोशनल ब्लैक मेल करती रहेंगी, आने वाले वर्ष में इन दो राज्यों में चुनावों के मध्यनजर लिया गया यह फैसला राज्य सरकार को कितना अधिक मुस्लिम वोट दिलायेगा यह तो समय ही बतायेगा, लेकिन यह साफ है कि इस देश का राजनेता मुसलमानों को ब्लैक मेल करने का कोई मौका हाथ से नहीं गंवाना चाहता, इस फिल्म को कर मुक्त करने के पीछे जस्टिफिकेशन दो हो सकती है, नम्बर एक कि इसमें हिन्दू धर्म का अपमान किया गया है, इसलिये मुसलमान खुश होगा दूसरी फिल्म में मात्र 30 सेकेण्ड की फुटेज मुसलिम बच्चियों को स्कूल भेजने पर भी थी, यदि इस संदेश को मुस्लिमों के घर-घर पहुंचाने की मानसिकता राज्य सरकार की है तो मैं सलाह दूंगा कि मुस्लिम बच्चियों को स्कूल भेजने वाली व कुरीतियों को समाप्त करने वाली देश के अच्छे से अच्छे कलाकार से बनवायें और सभी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में लोगों को दिखाये, लेकिन वह ऐसा नहीं करेगा क्योंकि उनको मुसलमानों का भला नहीं करना अपितु उनको ब्लैकमेल करना है, क्योंकि मुसलमानों का भला व विकास के दावे करने वाली सभी सरकारों की पोल पिछले दिनों प्रकाशित हुयी सच्चर आयोग ने खोल दी है, मुसलमानों की आर्थिक व सामाजिक दशा आजादी के बाद बद से बदतर हुयी है, मुसलमानों को यह बात समझनी होगी कि किसी भी राजनैतिक पार्टी का व्यक्ति हो वो उन्हें किसी भी तरह से मात्र रिझाने का प्रयास करते है और इससे अधिक उनकी कोई संवेदनशीलता मुसलमानों से नहीं, फिल्म पर दी गयी कर छूट से राजनेताओं की छोटी सोच दर्शाती है और फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों को प्रेरित करती है कि वो इस प्रकार की विवादस्पद फिल्में बनाये और उन पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेकें, जहां तक सवाल हिन्दुओं का है, उनकी जन भावनाओं की मैं समझता हूँ कि इस देश में किसी को कोई खाश चिन्ता नहीं है, रहा सवाल हिन्दूवादी संगठनों का इन्होंने भी इस माध्यम से अपनी दुकानदारी चलानी है, इसके सिवा कुछ होने जाना वाला नहीं, वरना फिल्म की तो बात छोड़ें यदि हम ध्यान दे ंतो दूरदर्शन पर भी दर्जनों ऐसे सीरियल व विज्ञापन भी ऐसे है, जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं व साधु-संन्यासियों का अपमान किया जाता है, लेकिन उस पर कोई विरोध नहीं होता है, तो फिर पी.के. का विरोध इतना क्यों ?

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page