"ब्राहमक विज्ञापन पर पतंजलि को सुप्रीम कोर्ट की फटकार" अन्य पर भी हो सख्त कार्यवाही

Updated: May 30, 2025
माननीय उच्चतम न्यायालय में उत्पादों को ब्राहमक मानकर पतंजलि के संस्थापक स्वामी रामदेव व बालकिशन को कड़ी फटकार ही नहीं लगाई अपितु उनके खिलाफ कार्यवाही करने के लिए अगली तारीख सुनिश्चित कर दी। दरअसल सुप्रीम कोर्ट के माननीय उच्चतम न्यायालय के इस फैसले को यदि व्यापक रूप में देखा जाए तो वह बहुत उचित फैसला है। लेकिन विज्ञापन जगत में जितने ब्राहमक विज्ञापन आते हैं उन सभी पर स्वयं ऑटो संज्ञान लेकर सभी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के अधीन कार्यवाही करनी चाहिए। कमोपेश भारतीय दूरदर्शन पर दिखने वाले सभी विज्ञापन ब्राहमक हैं और उत्पाद की गुणवत्ता को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। जोकि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए दिशा निर्देशों के खिलाफ है। यदि मैं उदाहरण देने लग जाऊं तो बहुत लम्बी लिस्ट इन विज्ञापनों की है। उदाहरण के तौर पर सर्दियों के दिनों में एक थरमल वियर का विज्ञापन आता है। जिसको पहनकर विज्ञापनदाता बर्फ से ढकी हुई किसी वस्तु को छुता है और वह बर्फ पिघल जाती है।
बीमा कंपनियों के विज्ञापन तो मानवता की भी सीमा तोड़ते हैं। एक विज्ञापन में एक महिला एक मृत्त पति की फोटो को गुस्से में देखकर बोल रही है कि आप तो बिना बीमा लिए चले गए अब इन बच्चों की पढ़ाई और घर की EMI कौन भरेगा। लगता है विज्ञापन बनाने वालों ने संवेदनशीलता की सारी सीमाएं पार कर दी हैं।
गर्मियों के दिनों में शीतल पेय के ऐसे-ऐसे उदाहरण आते हैं जिसको पीकर पीने वाला ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों से छलांग मारने लग जाता है। इन सब विज्ञापनों से खतरनाक वर्तमान में भारत सरकार ने गेमिंग एप्स को भारत में चलाने के लिए अनुमति दे दी है और उनका विज्ञापन सबसे ज्यादा खतरनाक है। हालांकि उस विज्ञापन के अंत में विज्ञापनकर्ता जल्दी-जल्दी यह बोलता है कि इस गेम से वित्तीय नुकसान भी हो सकता है और इसकी आदत भी पड़ सकती है। समझ नहीं आता कि इतनी खतरनाक चेतावनी वाले विज्ञापन को दूरदर्शन पर दिखाने की क्या मजबूरी है।
एयर कंडीशनिंग मशीन का एक विज्ञापन आता है जिसको ऑन करने से नल्के से टपकने वाला पानी जम जाता है। इस प्रकार के अनेकों उदाहरण है जिसमें गोरेपन की क्रीम जोकि अब भारी विरोध के बाद बंद हो गई है। बाल झड़ने के साबुन और ऐसी हवाई चप्पल जिसको पहनकर हवा में उड़ने लगता है। अनेकोंनेक उदाहरण है दरअसल ब्राहमक विज्ञापनों की कड़ी में एक विज्ञापन अमिताभ बच्चन एक क्रीम का विज्ञापन करते थे और क्लेम करते थे कि इस क्रीम का टीका 50 करोड़ भारतीय लगाते हैं। मैंने स्वयं उसके लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 50 करोड़ का आंकड़ा ना दिखाने का बदलाव करवाया।
इसी प्रकार एक व्हिस्की बनाने वाली कंपनी का विज्ञापन संजयदत्त इस कंपनी द्वारा बनाए जाने वाले सोडे के रूप में करते थे और उनके हाथ में व्हिस्की की बोतल होती थी। लंबे पत्राचार व चेतावनी के बाद मैं उस विज्ञापन में बदलाव करने में कामयाब हुआ और संजयदत्त के हाथ में व्हिस्की की जगह सोडे की बोतल दिखानी पड़ी।
यदि सरकार ने इस तरह की एप्स को मंजूरी देनी थी तो फिर लॉटरी ही क्यों बंद की थी। पूरे देश में सभी राज्य की लॉटरियों को जनता के भारी विरोध के बावजूद बंद करना पड़ा। दरअसल जानकारी प्राप्त करने के बाद पता चला कि विज्ञापन पर सेंसर बोर्ड का कोई नियंत्रण नहीं है। सभी चैनलों ने आपस में मिलकर Advertising standards Council of India (ASCI) नामक संस्था बनाई जो इन पर निगरानी रखती है। लेकिन यह कोई संवैधानिक संस्था नहीं है। इसी प्रकार एक पान मसाले का विज्ञापन आता है जो पूरा विज्ञापन बिना संवैधानिक चेतावनी को दिखाता है। अंत में जब उसका डिब्बा स्क्रीन पर दिखाया जाता है तब ही वैधानिक चेतावनी नीचे लिखी आती है। मेरा मानना है कि वैधानिक चेतावनी विज्ञापन शुरू होते ही लिखी आनी चाहिए और अंत तक रहनी चाहिए। यहां तक सवाल वैधानिक चेतावनी का है इसके लिए भी मैं लंबे अरसे से पत्राचार कर रहा हूं कि उसका साइज readable होना चाहिए जबकि उसका साइज बहुत छोटा होता है।
दरअसल यह विज्ञापन का माफिया देश में इतना बड़ा हो गया है कि बड़े उत्पादों की बात तो अलग है। पापड़ और अगरबत्ती जैसे उत्पाद भी आज बिना टीवी पर विज्ञापन के बेचना असंभव सा हो गया है। इसलिए मेरा मानना है कि विज्ञापन जगत के ऊपर निगरानी के लिए माननीय उच्चतम न्यायालय को एक मॉनिटरिंग कमेटी बनानी चाहिए जिस प्रकार की कार्यवाही पतंजलि पर की गयी उसी प्रकार की कार्यवाही अन्य ऐसे विज्ञापनदाताओं जो अपने उत्पाद की गुणवत्ता को कई गुना बढ़ा चढ़ाकर और ब्राहमक तरीके से प्रस्तुत करते हैं। इसके लिए उच्चतम न्यायालय को किसी Public Interest Litigation (PIL) का इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि विज्ञापन जगत बच्चों से लेकर बूढ़ों तक जुड़ा हुआ है।




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