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मोदी जी ! यह काम छोटा नही

Writer: शरद गोयल
शरद गोयल
Mar 5, 2018
3 min read

Updated: May 31, 2025


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा हाल ही में शुरू किये गये स्वच्छ भारत अभियान को एक बार तो लगभग सभी भातरीयो ने सराहा और मीडिया व सरकारी तंत्र ने भी बड़े गाजे-बाजे के साथ इसका आगाज किया । प्रधानमंत्री जी ने अमेरिका में अपने भाषण के दौरान कहा कि मैं भारतवासियों से एक छोटी सी चीज मांगता हॅू और वह है सफाई, दरअसल  मोदी जी सफाई का सीधा सम्बन्ध अनुशासन  से होता है और हम भातरीयों को अनुशासन में न रहना और जीवन के हर पहलुओं पर अनुशासन हीनता करना एक  गौरव की बात लगता है, फिर चाहें कहीं पर लाइन को तोड़ना, यातायात नियमों का उल्लंघन करना या और भी कोई क्षेत्र ऐसा हो जहां हमें अनुशासन दिखाने की आवश्यकता हो वहाँ हम हसे तोड़ने मंे बहुत गौरान्वित महसूस करते है, ऐसा नहीं कि हमंे अनुशासन में रहना नहीं आता  या एक गंदगी प्रिय है, हम भारतीय जब विदेशों में जाते है तो वहां पर ना तो हम गंदगी फैलाते है और विदेशियों से ज्यादा अनुशासन में रहते है, मुझे ऐसा लगता है कि इस में भी हमारी शिक्षा प्रणाली की कमी है हमारे पाठ्यक्रम में कहीं पर भी अनुशासन, साफ सफाई रखना, अपने कर्तव्य के प्रति वफादार रहना सही तरीके से नहीं पढाया जाता, जहाँ तक सफाई का सवाल है मात्र मोदी जी के कहने से ही सफाई नहीं होंगी चारो और सफाई रखना और अनुशासन में रहने को जीवन शैली में डालना होगा, इसके लिये समस्त सरकारी तन्त्र को भी संवेदनशील होने की आश्यकता है, सार्वजनिक स्थानों पर कचरा डालना, यह ठीक है कि हमारी आदत है, लेकिन क्या सरकारी तन्त्र सार्वजनिक स्थानों पर कूुड़ेदान व उनका निरस्तारण सही समय पर होता है या नहीं

 मुझे नही लगता कि अभी  किसी नियम या सफाई विभाग ने इस बात पर सर्वे किया हो कि कितने व्यक्तियों पर एक कूड़ेदान की आवश्यकता है, यदि ऐसा कोई सर्वे हिकया जगया हो तो मेें दोवे से कह सकता हॅू कि  उपयुक्त कूडेदानों के स्थान पर मात्र 10 प्रतिशत कूडे़दान ही लगाये गये है और उनकी भी सही समय पर सफाई नहींे होती सरकारी तन्त्र को हम विषय  पर बहुत ही संवेदनशील होना पड़ेगा, अक्सर आम आदमी को खुले में टायलेट करते हुये मीडिया दिखाता रहता है, और हर आदमी इस समस्या से परेशान है कि हम खुले में  पेशाव करते है, लेकिन कभी क्या एक हजार की आबादी वाले क्षेत्र में कितने कूड़़ेदान और कितने पेशाव घरों की आवश्यकता है, और वर्तमान मंे सरकार ने कितना लगा रखा है, मुझे यह कहते हुये भी कोई संकोच नहीं हो रहा कि हमारी बहुत सारी धार्मिक मान्यताओं को भी सही तरीके से जीवन में ग्रहण करने पर भी कचरा व कूड़ा सार्वजनिक स्थानों पर फैलता है, सड़क किनारे अक्सर भण्डारों का आयोजन किया जाता है और बाद में सड़क पर फैला रहता है, किसी त्योहार पर मीठे पानी को बांटाा जाता है तो सैकड़ो मीटर दूर तक प्लास्टिक के गिलास सड़क पर अक्सर देखने को मिलते है, यदि नदियों की बात करे तो मैं दावे से कह सकता हॅॅॅू कि नदियों को गंदा करने में हमारे धार्मिक अनुष्ठानों और रीति रिवाजों का एक बहुत बड़ा हाथ है, दरअसल हम नदियों को प्यार नही करते अपितु उनकी पूजा करते है, और पूजा में उपयोग की गयी सभी चीजें नदियों को मैला करने के लिये काफी है, इसी प्रकार बहुत से धार्मिक अनुष्ठान ऐसे है, जिनसे हमारे आस-पास, गंदगी, प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण फैलता है, हमारे धर्मगुरूओं को भी इस और संवेदनशील होने की आवश्यकता है।

          जहाँ तक सवाल राजनैताओं का है मुझे लगता है कि राजनीति ओर अनुशासन का कोई रिश्ता नहीं है, मोदी जी ने अमेरिका से आने के बाद बीजेपी के मुख्य कार्यालय में भारी जश्न मनाया गया और आतिश वाजी की गयी,  अतिशबाजी करते समय किसी भी नेता के दिमाग में यह नहीं आया कि अभी 48 घण्टे  पहले उनके प्रधानमंत्री सफाई पर बोल कर आ रहे है आतिशबाजी  का कचरा दो दिन में साफ हुआ, हरियाणा  के चुनाव आयोग के कड़े रूख के बाद भी सार्वजनिक स्थानों पर पोस्टरों ने हालत खराब की हुयी है। ऐसा नहीं है कि कानून उनको रोकता नही है। सार्वजनिक स्थानों पर विज्ञापन, साम्रगी लगाने पर भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार दण्डनीय अपराथ है लेकिन शायद वह राजनैताओं पर लागू नहीं होता है, मोदी जी के आहवाहन से एक साफ आदमी की इस ओर सोच अवश्य गयी है कि इस पहलू पर भी सोचना चाहिये वरना विदेशों में पूरी तरह से अनुशासन में रहने वाले भारतीय भारत में अनुशासन तोड़ कर अपने आप को गौरान्वित महसूस करता है, इस  अभियान के साथ-2 इन्फ्रास्ट्रेक्चर को भी डेवलप किया जाये ताकि सार्वजनिक स्थानों को गंदा करने वालों के पास ऐसा करने को कोई जवाब न हो। इस समस्या से  जुड़े हुये सभी पक्षों को ज्ञान में लेकर हम पर चारोें और से कार्य करने की आवश्यकता है, मुझे लगता है कि यह एक बहुत बड़ा काम है, परन्तु असम्भव नहीं है।

 

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