लोकतन्त्र को पंगु किया राजतन्त्र ने

Updated: May 31, 2025
26 मार्च 2014 को देश की सोलहवीं लोकसभा ने 10 साल के कांग्रेस के शासन के बाद भारी बहुमत से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में अपने 29 दलों के साथियों एन.डी.ए. को दिल्ली की सत्ता पर सत्तारुढ़ होने का मौका भारत के नागरिकों ने दिया, नये वादो, नयी उम्मीदों व नयी आशाओं के साथ नये प्रधानमंत्री ने देश की बागडोर सम्भाली, 543 सदस्यों वाली लोकसभा में एन.डी.ए. के विशाल 280 सदस्य भारतीय जनता पार्टी व अन्य 334 सदस्यों का बहुमत है, सरकार द्वारा अपनी योजनाओं को लागू करने में रुकावट के तौर पर राज्य सभा में बहुमत न होना एक मुख्य कारण बताया जा रहा है, और वर्तमान परिस्थितियों को देखकर ऐसा लगता भी नही कि 2019 तक राज्यसभा में वर्तमान सरकार का या कहे कि एन.डी.ए. को बहुमत हो पायेगा, तो क्या विशाल जन मानस द्वारा दिया गया प्रचण्ड बहुमत उस संस्था के सामने फेल हो गया जो जन साधारण का प्रतिनिधित्व नही करती शायद राज्य सभा को बनाने वालों ने इस तरह की परिस्थितियो का कभी आंकलन नही किया होगा क्योंकि राज्य सभा मे आने वाले लोगों का देश के अन्य नागरिकों की समस्याओं से सीधे-2 कोई संवाद या सम्पर्क नही होता है अगर प्रचण्ड बहुमत वाली लोकसभा राज्यसभा के सामने बौनी है तो इस सारी व्यवस्था पर पुर्नविचार करना होगा, वैसे समय-2 पर यह बहस भी होती आयी है कि लोकसभा की उपस्थिति में राज्यसभा का औचित्य क्या है राज्यसभा खिलाड़ियों, उद्योगपतियों फिल्मी सितारों या वह नेता जो आम आदमियों द्वारा चुनाव में नकार दिये गये उनका एक जमावड़ा बन गया, वर्तमान राज्य सभा का हाल देखे तो 240 सदस्यों की राज्यसभा में 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये जाते है और एन.डी.ए. के मात्र 67 सदस्य है, जो कि बहुमत से बहुत दूर है, राज्य सभा, लोकसभा द्वारा बनाये गये नियमों का अनुमोदन करती है, दरअसल इसी कार्य के लिये राज्यसभा का गठन किया गया था, समाज के विभिन्न वर्गों व क्षेत्रों के लोग द्वारा लिये गये फैसलों का राष्ट्रहित में अपने विवेक से अनुमोदन करे लेकिन विवेक से अनुमोदन करने की प्रथा अब राज्यसभा में नहीं रही वहां पर भी संख्या बल के आधार पर ही पार्टी लाइन पर फैसले लिये जाते है सामान्यतः यह माना जाता था कि राज्य सभा का सदस्य पार्टी लाइन से उपर उठकर अपने विवेक से जनहित में अपनी सलाह देगा लेकिन अब ऐसा नही हो रहा है कारणवश सरकार के बहुत से बिल राज्यसभा में सरकार का बहुमत न होने के कारण पास नही हो पा रहे है, मसलन भूमि अधिग्रहण बिल, रियल स्टेट रेगुलेटरी बिल, जी.एस.टी. इत्यादि, राज्यसभा में लोकसभा द्वारा पास किये गये फैसलों में मतभेद होना कोई नयी बात नही है। जवाहरलाल नेहरू जी के कार्यकाल में भी बहुत सी बातों में लोकसभा द्वारा लिये गये निर्णयों का राज्य सभा में उचित विरोध होता था और तत्कालीन सदस्यों को उस समय की सरकार उनके अनुसार परिवर्तन करती थी लेकिन अब की स्थिति पहले से कई ज्यादा खराब है, अब राज्य सभा भी लोकसभा की भांति संख्याबल पर चलने लगी है, जोकि एक सुदृढ़ व्यवस्था के लिये सकारात्मक संदेश नही है, हालांकि यदि सरकार पर पड़ने वाले बोझ के हिसाब से आंकलन करे तो राज्यसभा में कोई पीछे नही है एक आंकलन के हिसाब से राज्यसभा की कार्यवाही में भी प्रति मिनट 2.5 लाख रुपये का वहन करना होता है, और यदि इतना खर्च करने वाली संस्था भी सरकार के कार्यों या देश की योजनाओं में सहायक के बजाय बाधक हो तो इसका औचित्य कुछ नहीं रह पायेगा, आवश्यकता है कि राज्य सभा के सदस्यों द्वारा हर विषय पर गंभीरता से विचार करके व्यक्तिगत सुझावों द्वारा उन विचारों के पक्ष या विपक्ष में फैसला लें, न कि पार्टी गाइड लाइन के हिसाब से, अगर लोकसभा जोकि सवा सौ करोड़ आबादी के देश का प्रतिनिधित्व करती है, राज्य सभा के सामने अपाहिज हो जाये तो देश के प्रजा तांत्रिक व्यवस्था के लिये स्वस्थ परम्परा नही होगी और महत्वपूर्ण निर्णय राजनैतिक सोदे बाजियों की भेंट चढ़ते रहेंगे या फिर लम्बित पड़े रहेंगे, सभी राजनैतिक दलों को इस ओर विचार करना होगा क्योंकि ऐसी स्थिति किसी भी दल के शासन के दौरान आ सकती है।




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