संसद यदि ऐसे ही चलनी है तो सत्र बुलाने की आवश्यकता ही क्या है ?
चार सप्ताह का मानसून सत्र समाप्त होने में मात्र दो दिन ही बचे हैं और किसी ना किसी विषय पर विपक्ष और सत्ता पक्ष का गतिरोध हमेशा की भांति जारी है। ऐसा लगता है कि विपक्ष ने सत्ताधारी दल द्वारा किए गए हर कार्य का विरोध व आलोचना करने की जैसे कसम खा रखी है। विपक्ष का काम सदन में सरकार की नीति व रीति की विवेचना करना है ना कि सरकार द्वारा किए गए हर कार्य का विरोध। पिछले 12 सालों में मुझे याद नहीं आता कि सरकार द्वारा किए गए किसी भी कार्य का विपक्ष द्वारा समर्थन किया गया है तो क्या पिछले 12 सालों में सरकार द्वारा कोई भी कार्य राष्ट्रहित में नहीं किया गया। हालांकि आश्चर्य की बात एक और भी है कि विपक्ष के इस प्रकार के रवैये के बावजूद सरकार जो बिल सदन में पास कराना चाहती है वो करवा भी लेती है। इन 12 सालों में सदन के अंदर चर्चा, ब्यान और बहस के स्तर में जो गिरावट आई है वो आजादी के बाद कभी नहीं देखी गई। विपक्ष का कार्य सरकार द्वारा किए गए कार्य की विवेचना के आधार पर आलोचना करना है ना कि सरकार के हर कार्य की आलोचना। और ऐसी ही इस सदन की परिपाटी रही है। लेकिन अब तो ऐसा महसूस होता है कि विपक्षी केवल और केवल विरोध प्रकट करने सदन में आते हैं।
कभी-कभी मुझे लगता है कि जब से लोकसभा, राज्यसभा की कार्यवाही का टीवी पर सीधा प्रसारण आने लगा है तब से सांसदों में कैमरे पर दिखने के लिए बेहूदा आचरण का रिवाज हो गया है और सदस्यगण कैमरे पर दिखनेभर के लिए वो बातें करते हैं जो सरकार के विरुद्ध हो, नीतियों के विरुद्ध हो, धर्म के विरुद्ध हो और जो टीवी चैनल में बहस का मुद्दा बन जाए।
ऐसा नहीं है कि जो आज सत्ता पक्ष में बैठे हैं वो जब विपक्ष में थे उनका आचरण बहुत आदर्श था I किन्तु सदन में सांसदों के आचरण में दिन- प्रतिदिन गिरावट देखने को मिलती जा रही है। यही कारण है कि राजनीति में बुद्धिजीवी, पढ़ें लिखे और विचारकों की बहुत कमी होती जा रही है। देश के विशेष वर्ग में राजनीति को हर प्रकार की ताकत प्राप्त करने का जरिया समझ लिया है।
अगर सांसदों के व्यवहार में इसी प्रकार गिरावट आती रही तो वो दिन दूर नहीं जब सदन में और सदन के बाहर भी सांसद आपस में हाथापाई करते नजर आएंगे । लोकसभा, राज्यसभा के सभी सांसदों को राष्ट्रहित में इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता है और भारत के संसद की कार्यवाही विश्व में एक उदाहरण बने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। अन्यथा यदि ऐसे ही चला तो संसद की कार्यवाही में tax payer के करोड़ों रुपए रोज खर्च करके सदन का सत्र बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है I इसका कोई और विकल्प ढूंढना होगा I




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