top of page
logo.jpg
  • Facebook

ताकि मात्र इवेंट न बने ‘कन्या बचाओ, कन्या पढ़ाओ‘ अभियान

Writer: शरद गोयल
शरद गोयल
Jan 1, 2023
6 min read

Updated: May 31, 2025

हाल ही में भारत सरकार द्वारा चलाया गया अभियान ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ‘ को मीडिया में खासी तबज्जो मिल रही है और सच बात तो यह है कि मिलनी भी चाहिए क्योंकि बेटी को बचाना और पढ़ाना भारत की एक सामाजिक समस्या है। इस ओर सरकार द्वारा एक अभियान के तहत ध्यान दिए जाने के लिए वाकई सरकार बधाई की पात्र है। लेकिन इस समस्या से लड़ने के लिए सबसे पहले इसके भिन्न-भिन्न पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना होगा। आखिर हमारे समाज में कन्याओं की भ्रूण हत्या क्यों की जाती है? समाज में या कहिए संसार में आने के बाद बालिका और बालक में शारीरिक अंतर के अतिरिक्त जो बाकी अंतर है , वह सब समाज के ˜ारा बनाया गया है। दरअसल शुरू से ही पुरूष ने इस पृथ्वी को पुरूष प्रधान बनाए रखने का प्रयास किया है और महिला व बालिका को दूसरा स्थान दिया गया है। इस मानसिकता को छुपाने के लिए सामाजिक तौर पर पुरूष ने महिला को अपने से अधिक पूजनीय दिखाने का दिखावा किया। यदि इतिहास पर ध्यान दें तो हम पायेंगे कि पुरूष ने कभी भी महिला को बराबरी का स्थान नहीं दिया।


दरअसल हम यदि कन्या भ्रूण हत्या की बात करते हैं तो हमें वो कारण खोजने होंगे जिनकी वजह से कन्या भ्रूण हत्या की जाती है। मेरा निजी तौर पर मानना है कि कन्या भ्रूण हत्या के पीछे समाज में कन्याओं के प्रति असुरक्षा की जो भावना हैै, पहले तो वह कहीं न कहीं पुरूष को या कहें कि उसके माता-पिता को डराती है। कन्या भ्रूण हत्या का सवाल सीधे-सीधे कन्याओं की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। कन्याओं के प्रति समाज में बढ़ते अपराधों का कन्या के माता-पिता को उसकी भ्रूण हत्या करने के लिए काफी हद तक उŸोजित करता है। इस पहलू पर हमें गंभीरता से विचार कर समाज में बलात्कार जैसे कानूनों में सख्त से सख्त सजा का प्रावधान करना होगा।


दूसरा विषय जो कन्या भ्रूण हत्या के लिए ज्यादा गंभीर है, वह है समाज में दहेज के प्रति बढ़ता आर्कषण। कन्या को पाल पौष कर बढ़ा करना उसकी शिक्षा की जिम्मेदारी तक का सफर उसके मां-बाप को इतना बोझल नहीं करता जितना कि दहेज का बोझ उनकी कमर तोड़ता है। पिछले दो दशकों में महानगरों में जिस हिसाब से शादियों में दिखावे और पैसे का आडम्बर शुरू हुआ है , उसको देख उन सब आडम्बरों को पूरा न कर पाने की क्षमताहीन व्यक्ति उस डर के मारे ही कन्या पैदा होने के नाम से डरता हैै। ऐसा नहीं कि समाज के विकास में महिलाओं का योगदान कम रहा हो, अतीत से लेकर आज तक महिलाओं का योगदान हर क्षेत्र में अत्यंत सराहनीय रहा है। फिर चाहे समाज का कोई भी क्षेत्र हो, जहां महिला को मौका मिला वहां उसने अपनी प्रतिभा का पूरा प्रदर्शन किया।


संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर वर्ष साढ़े सात लाख कन्याओं को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक गत बीस सालों में भारत में लगभग 1 करोड़ कन्याओं की भ्रूण हत्या की गई है। 2011 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 1000 लड़कों की तुलना में 914.23 लड़कियों का जन्म हुआ जबकि 2001 में यह अनुपात 927.31 था।


भारत में बाल लिंग अनुपात में गिरावट जनगणना के आंकड़ों की तुलना करने से स्पष्ट नजर आती है। 1991 में यह आंकड़ा 1000 लड़कों पर 947 लड़कियां था। दस साल बाद यह 1000 लड़कों के लिए 947 लड़कियां रह गया। 1991 के बाद से भारत में महाराष्ट्र, गुजरात ,पंजाब, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों तथा 80 फीसद जिलों में इस अवधि में बच्चे के लिंग अनुपात में 50 से अधिक बिंदु की गिरावट दर्ज की गई है। पंजाब राज्य में लिंग अनुपात की सबसे खराब स्थिति दर्ज की गई है।


यह भयावह आंकड़े भले कुछ भी कहें और इस बारे में कानून जो भी हो लेकिन कड़वा सच यह है कि भ्रूण के लिंग निर्धारण और सेक्स चयनात्मक गर्भपात उद्योग आज भारत में 1000 करोड़ रूपये के आंकड़ो को पार कर गया है। यह 244 लाख अमेरिकी डाॅलर का व्यापार हो गया है। स्थिति यह है कि भारत में मोबाइल सेक्स सेलेक्शन क्लीनिक स्थापित हो रहे हैं। ये महिलाओें को उनके घर या आसपास ही चैक पर सबकुछ बता देते हैं। इन पर नजर रखना भी आसान नहीं है। पीसीपीएनडीटी कानून 1994 में 2003 में संशोधन किया गया था और इसमें चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगों को शामिल किया गया था। ताज्जुब होता है कि इस कानून के बनने के पहले तीन सालों में देश के 35 राज्यों में से 22 राज्यों में इस कानून की उल्लंघना का एक भी केस दर्ज नहीं हुआ था। क्या यह संभव है? शायद नहीं, यह इस बात का सूचक है कि इस कानून के अंतर्गत जांच में कोताही बरती गई। दिल्ली में सर्वाधिक 76 केस दर्ज हुए जिसमें 69 मामले जन्म का पंजीकरण नहीं करने के थे। पंजाब में 67 और गुजरात में 57 केस दर्ज हुए लेकिन यह लड़ाई अभी अधूरी है।


हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसले में मुंबई उच्च न्यायालय लिंग चयन इलाज पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया। अदालत ने अधिनियम में संशोधन को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि पूर्व गर्भधान लिंग निर्धारण एक महिला से उसके जीने का अधिकार छीनना है और यह संविधान के खिलाफ है। भले ही हरियाणा में लड़कों ने दुल्हनों की समस्या का एक अस्थायी समाधान ढूंढ लिया हो, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि लिंग अनुपात बढ़ने से बहुत सी समस्याएं बढ़ रही हंै। इससे यौन शोषण के मामले बढ़ रहे हैं। महिलाओं व कन्याओं के प्रति अपराध बढ़ रहा है। बाल विवाह के मामले बढ़ रहे हैं और इस वजह से प्रसूति के दौरान मौत और गर्भपात के दौरान मौत की घटनाओं में भयावह वृद्धि दर्ज हो रही है।


पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम के तहत दर्ज किए गए 400 से अधिक मामलेे में 300 रूपए से लेकर 4,000 रूपए जुर्माने की सजाएं हुईं हंै। लिंग निर्धारण की मांग में परिवर्तन लाने के लिए एक लंबी प्रक्रिया है। महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण और महिलाओं की संपŸिा भूमि अधिकार देकर ही सुधार की उम्मीद की जा सकती है। पूर्वोतर के राज्यों और केरल में जहां इस प्रकार के अधिकार महिलाओं के पास हैं, वहां लिंग अनुपात की स्थिति तुलनात्मक बेहतर है। लिंग चयन के खिलाफ लड़ाई लंबे समय तक लड़नी होगी, तभी कुछ परिणामों की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन पंजाब के एक छोटे से गांव लखनपाल तो जैसा इसका अपवाद ही है। पहली बार पुरूष जन्मों का ज्वार बदल गया है। देश में सबसे कम लिंगानुपात वाले राज्य पंजाब के इस गांव लखनपाल में हर 1000 लड़कों के लिए 1400 लड़कियां हैं।


एक बात और इस सारे विषय में ध्यान देने योग्य है कि बहुत सारी हमारी मान्यताएं भी ऐसी हैं जिनमें पुत्र के जन्म को या कह लीजिए पुत्र के होने को या पुत्र के माता-पिता होने को धार्मिक दृष्टिकोण से बहुत महिमा मंडित किया गया है। धार्मिक मान्याताओं के अनुसार माता-पिता का श्राद्ध केवल पुत्र ही कर सकता है, यह अधिकार पुत्री को नहीं है। मृत्यु के समय में सभी धार्मिक अनुष्ठान पुत्र द्वारा ही कराए जाते हैं। यहां तक कि पितृों के लिए अमावस्या को खाना भी पुत्रों द्वारा ही निकाला जाता है। पुत्र को ही अपने पिता का गौत्र इस्तेमाल करने का प्रचलन है। बहुत सारे धार्मिक ग्रंथ ऐसे हैं जिनमें पुत्र के न होने को माता-पिता के लिए विशेषतः माता के लिए एक दोष की तरह से माना जाता है और पुत्र की प्राप्ति की उम्मीद में महिला को कई लड़कियों को जन्म देना पड़ता है। क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मनुष्य की मुक्ति तब तक नहीं होती जब तक उसके पुत्र द्वारा सभी अंतिम अनुष्ठान न किये जायें । अगर धार्मिक मान्याताओं की मानें तो पुत्री को उन्होंने पिता के घर में बहुत ही कम महŸव दिया । कहीं न कहीं इस प्रकार की धारणाएं भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए जिम्मेदार हैं। हमारे धर्म के सभी बुद्धिजीवी , विचारक व ठेकेदारों को सामूहिक तौर पर यह निर्णय लेना होगा कि इस तरह के व्याख्यान जिन में पुत्र का पैदा होना , पुत्र का माता-पिता होने को महिमा मंडित किया गया है, उन का प्रचार -प्रसार बंद किया जाए। इतिहास में भी इस प्रकार की कुरीतियों को देखते हुए धार्मिक मान्यताओं में बदलाव किया गया हैै। शादी के लिए स्वयंवर रचाना, बाल-विवाह करना व सती प्रथा आदि न जाने कितनी कुरीतियां ऐसी थीं जिनको समय पर बदला गया और आहिस्ता- आहिस्ता उसके परिणाम सामने आए। जहां तक सवाल है राजनीतिक पहल का वह सिर्फ राजनीतिक वाह वाही लूटने के लिए तो हो सकती है इसके अलावा इसका कोई खास उपयोग नहीं होगा। ‘सेव टाइगर‘ की तरह ‘कन्या बचाओ, कन्या पढ़ाओ‘ अभियान काॅरपोरेट सोशल रीसपोंसीबलीटी को पूरा करने मात्र का माध्यम तो बन सकता है, इसके सिवाए मुझे और कुछ ज्यादा होता नजर नहीं आ रहा है। हमें सामूहिक रूप से यह विचार करना होगा कि हम कन्या की हत्या उसके पैदा होने से पहले किन कारणों से करते हैं और उन कारणों को गंभीरतापूर्वक समाप्त करना होगा। सबसे पहला कदम कन्या को पैदा होने के बाद सुरक्षा प्रदान करना है। उसको समाज में, स्कूल में , काॅलेज में व उसके चारों तरफ वही वातावरण देना है जो एक पुरूष को या लड़के को दिया जाता है। दूसरा कार्य उसकी शादी पर किये जाने वाला खर्च उसके माता-पिता पर बोझ न बने, इसको सुनिश्चित करना समाज की जिम्मेदारी होनी चाहिए और तीसरा प्रयास धार्मिक अनुष्ठानों में पुत्री को उतना ही महŸव दिया जाना चाहिए, जितना कि पुत्र को । अन्यथा ‘कन्या बचाओ, कन्या पढ़ाओ‘ का नारा भी अन्य राजनीतिक नारों की तरह से एक इवेंट की तरह ही बन कर रह जाएगा।

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page