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दिल्ली के नतीजे मंथन का समय

Writer: शरद गोयल
शरद गोयल
Dec 1, 2024
3 min read

Updated: May 30, 2025


दिल्ली विधानसभा के नतीजे देश के लिए जहां चैंकाने वाले हैं वहीं इन नतीजों के साथ देशव्यापी बहस भी शुरू हो गई कि आखिर ये नतीजे इतने चैंकाने वाले कैसे आ गये ? दरअसल इन नतीजों का यदि विश्लेषण करें तो दो मुद्दे मुख्य रूप से सामने आते हैं कि पिछले एक साल में दिल्ली की जनता के साथ जो खिलवाड़ केन्द्र सरकार ने किया उसको दिल्ली की जनता किसी भी मायने में सहन नहीं कर पायी, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है और दिल्ली विधानसभा को बहुत ही सीमित अधिकार हैं। यह आम मतदाता जानता है, बावजूद इसके इतने भारी समर्थन से एक ऐसी पार्टी को सŸाारूढ़ करना जिसके पास अनुभव व अधिकार दोनों का अभाव है, दरअसल बीजेपी आला कमान ने जितनी गंभीरता से अरविंद केजरीवाल को लिया यदि वो एक साल इतनी गंभीरता से दिल्ली की समस्या को लेते तो नतीजे शायद कुछ और होते। केन्द्र सरकार को चाहिये था कि इस एक साल में दिल्ली में वो सब कुछ, कुछ हद तक करके दिखाती जो वह पांच साल में दिल्ली के साथ करना चाहती थी। मूलभूत समस्याएं जो दिल्ली की हैं उनको ठीक करने के लिए यह आवश्यक नहीं कि विधानसभा में कोई सरकार हो, दिल्ली के आम नागरिक का पाला दिल्ली नगर निगम के विभागों द्वारा ही पड़ता है, गली-मोहल्ले की सफाई, कचरे का निस्तारण, मकान बनाते समय नक्शा पास करना, हाऊस टैक्स व सीवर आदि की सफाई इत्यादि समस्याओं का निपटारा नगर निगम में ही होता है और नगर निगम में ही बीजेपी का वर्चस्व है। एक सर्वे के अनुसार देश के पांच बड़े भ्रष्टतम विभागों में से एक विभाग दिल्ली नगर निगम है। एक व्यक्ति ने मुझे कहा कि किसी भी विभाग में वहां के कर्मचारी व अधिकारी पैसा मांगते हैं पर दिल्ली नगर निगम की तो दीवारें भी पैसा मांगती हैं। लोकसभा में आसीन होेते ही सबसे पहले मोदी जी को दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने का प्रयास करना चाहिये था। दिल्ली के सभी निगम आयुक्तों की बैठक बुलाकर दिल्ली की सफाई व्यवस्था दुरूस्त करने व भ्रष्टाचार खत्म करने के निर्देश दिये जाते। अत्याधुनिक नयी तकनीक वाली सफाई की मशीनों को दिल्ली लाया जाता। दो अक्टूबर को स्वच्छ भारत अभियान के समय अच्छा होता कि मोदी जी नगर निगम को यह आदेश देते कि 26 जनवरी तक दिल्ली में 5000 सार्वजनिक शौचालयों को निर्माण करना है और उसको करके दिखाते । दिल्ली पुलिस को सख्त निर्देश दिये जाते, भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जाती, संवेदनहीन हो चुके अधिकारियों को तुरंत बदला जाता और दिल्ली पुलिस को एक नयी छवि के साथ दिल्ली में उतारा जाता, यमुना की सफाई का कार्य शुरू किया जाता, झुग्गी वालों को पक्के घर देने की योजना का ब्लू प्रिन्ट बनाया जाता। इनमें से किसी भी काम को करने के लिये दिल्ली में विधानसभा व मुख्यमंत्री की आवश्यकता नहीं है। 1952 से लेकर 1992 तक लगभग 40 साल दिल्ली में विधानसभा नहीं रही, तो इसका मतलब यह नहीं कि दिल्ली में कोई काम नहीं हुआ। दिल्ली में काम कराने के लिये विधानसभा व मुख्यमंत्री की आवश्यकता नहीं है, यह सबको पता है दरअसल हारने वाली पार्टी की आलोचना व जीतने वाली की तारीफ करना यह बड़ी साधारण सी बात है। 15 साल तक दिल्ली की कुर्सी पर आसीन रहने वाली कांग्रेस पार्टी आज दिल्ली में अपना खाता भी नहीं खोल पायी, यह कोई छोटी बात नहीं है। यह सभी राजनेताओं के लिए बहुत गंभीरता से सोचने वाला विषय है। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी हकीकत है कि आत्ममंथन करके हार के कारणों की समीक्षा करना भी आवश्यक है। संगठनात्मक फैसलों की मैं इस समय चर्चा नहीं करना चाहता कि किरण बेदी को लाया गया या किसी ओर को हटाया गया और उसके कारण ऐसा हुआ। हां, एक बात अवश्य थी कि आम आदमी पार्टी का कार्यकर्Ÿाा घर-घर जाकर एक-एक मतदाता से संपर्क कर रहा था। जबकि बीजेपी का कार्यकर्Ÿाा बड़े नेताओं की रैली में ही भागदौड़ करके अपनी सांस फूला रहा था। मैं इन नतीजों को मोदी जी की हार या मोदीरथ को रोकने जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं कर रहा हूं लेकिन दिल्ली बीजेपी के संगठन में बड़े बदलाव की आवश्यकता है। यह इन नतीजों ने तय कर दिया है। शंका सिर्फ इस बात की है कि 70 में से 65 सीटें लाने के बावजूद भी आप के मुख्यमंत्री किस हद तक दिल्ली वालों को इन समस्याओं से मुक्त कर पायेंगे या फिर रोज प्रधानमंत्री निवास, राज्यपाल, राजभवन व राष्ट्रपति जी से मुलाकात में ही पांच साल गुजार देंगें।

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