मेक इन इंडिया

Updated: May 31, 2025
मेक इन इंडिया अर्थात भारत में उत्पादन करो नारा हाल ही में प्रधान मंत्री जी ने देश के सामने लाया है, यद्यपि यही विचार तो इसके पूर्व 2014 के आम लोक सभा के चुनाव के दौरान मुख्य मुद्दा बना रहा था। वास्तव में तो मुख्य मुद्दे पर ही देश ने जर्बादस्त करवट बदली है। भले ही यह मुद्दा 2014 के लोक सभा चुनाव का केन्द्र बिन्दु बना है, परन्तु यदि गम्भीरता से विचार किया जाय तो यह विचार नया नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त पश्चात् भी इसी विचार से पे्ररित होकर प्रथम प्रधान मंत्री श्री नेहरु ने तत्कालीन उद्योगिक संस्थानों को मंदिरों की प्रतिष्ठा दी थी। तत्पश्चात् लाल बहादुर शास्त्री जी ने भी जय जवान जय किसान का उद्घोष देश के उत्पादन को प्रोत्साहन करने के लिये ही किया था। 1990 के दशक के प्रारम्भ में उदारवादी-औद्योगिक नीति भारत के तत्कालीन कर्मचारी ने देश में इसी उत्पादन क्षेत्र के विकास पर बल देने के लिये लागू की थी। अतः स्पष्ट है कि मेक इन इंडिया की सोच नयी नहीं - पहले से ही देश में चली आ रही है।
वास्तव में उत्पादन क्षेत्र का विस्तार और विकास न केवल आवश्यक है वरन् अनिवार्य है। देश का दुर्भाग्य ही मानता होगा कि देश में विकास के सिर्फ उत्पादन पर बल तो दिया गया किन्तु मूलरुप इसे नहीं दिया जा सका। उत्पादन के क्षेत्र देश में ही नहीं विश्व में कृषि और मैन्यूफैक्चरिंग स्वीकार किये गये है। पर देश का दुर्भाग्य है कि देश में इन्हीं उत्पादन क्षेत्रों की उपेक्षा होती रही। 1995-1996 में औद्योगिक क्षेत्र की भागीदारी सकल घरेलू उत्पादनें 29.24 प्रतिशत थी जो 2008-2011 के दौरान 15.9 प्रतिशत रह गयी है जो 28 मार्च 2012 को संसद में सरकार ने स्वीकार किया है। इसी प्रकार खेती की भागीदारी 1950-51 में 56.46 प्रतिशत थी जो 2007-2008 में घटकर 16.8 प्रतिशत रह गयी एवं 2011-2012 में
13.9 प्रतिशत तक पहुंच गयी जो 23 मार्च 2012 को सरकार ने सदन में स्वीकार की है। अनेक विद्वानों का अनुमान है कि यदि यही क्रम जारी रहा तो 2019-2020 तक यह 10 प्रतिशत के लगभग पहुंच जायेगी इन्ही उत्पादन क्षेत्रों पर देश की आबादी का लगभग 60 प्रतिशत से अधिक रोजी रोटी के लिये निर्भर है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में वार्षिक विकास की दर 2010-2011 में 8.9 प्रतिशत आके गयी थी जो 2012-2013 के अप्रैल से सितम्बर तक 0.17 प्रतिशत रह गयी जिसे सरकार ने 9 दिसम्बर 2013 को स्वीकार किया और इसी के अन्तिम अंाकलन के तहत तो जुलाई 2014 में यह 0.5 प्रतिशत ही रह गयी है।
वास्तव में विकास का अग्रदूत तो उत्पादन क्षेत्र ही होता है। अपनी असफलताओं को छिपाने के लिये तर्क दिया जाता है कि आबादी की अधिकता और उसका घनत्व विकास के मार्ग में सबसे बड़ा वाधक हैं और भारत इसका शिकार हैं परन्तु विश्व पर दृष्टिपात डालें तो देखिये नीदरलैण्ड 498 लोग प्रति .......... मीटर घनत्व वाला देश है परन्तु विश्व के विकास के पैमाने पर पड़े पायदान पर खड़ा है जर्मनी 232 घनत्व पर विकास का पायेदान 6 यू.के. 265 पर विकासीय पायदान 14 जापान 349 पर विकास का स्थान 17वां और भारत 378 घनत्व और पर विकास की सीड़ी के 135वें पायदान पर है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट प्रमाणित होता है कि जनसंख्या पिछड़ेपन की मुख्य कारण नहीं होती वरन् विकास के लिये तो संसाधनों को विकास करना हो, अपने प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग ही विकास की ऊँची सीढ़ियों तय करता है।
देश में विकास चाहिये तो प्रधान मंत्री के मेक इन इंडिया नारे को मूर्त रुप देना ही होगा। उत्पादन क्षेत्रों के विकास और विस्तार से ही देश को समृद्धि के शिकार पर पहुंचाया जा सकता है मात्र सेवा-क्षेत्र के माध्यम से विकास को कभी स्थायी और आत्मनिर्भर बना कर सर्वजन हिताय के लिये लाभकारी नहीं बनाया जा सकता हैं।
आज मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ावा देने पर विचार करने की आवश्यकता है। सोचना होगा कि समय समय पर उत्पादन बढ़ाने पर बल देने के बावजूद इसे मूर्त रुप क्यों नहीं मिला। उत्पादन क्षेत्र में ईंधन की सबसे बड़ी भूमिका होती है देश में ईंधन के स्त्रोत के रुप में बिजली ओर पैट्रोलियम मुख्य है। बिजली का उत्पादन लागत औसत 3.17 रुपया कि0 भा0 तथा इसे उपभोक्ताओं तक पहंुचाने में खर्चा 5.01 रुपया कि0भा0 आता है। जिसे सरकार ने 20 दिसम्बर 1913 को स्वीकारा है साथ ही उपभोक्ताओं से बिजली की कीमत जो वसूली जा रही है वह घरेलू उपभोक्ताओं से 583-1127 रुपया प्रति कि0भा0, व्यापारिक उपभोक्ताओं से 1123-1530 रुपया कि0भा0 कृषि उपभोक्ताओं से 659 रुपया प्रति कि0भा0 और औद्योगिक उपभोक्ताओं से 1053-1165 रुपया प्रति कि0भा0 जिसे सरकार ने 7 अगसत 2014 को सदन में स्वीकार किया है इसी प्रकार दूसरा ईंधन का स्त्रोत पैट्रोलियम है विश्व में प्रचलित मुद्राओं की क्रय ....... के आधार पर भारत में पैट्रोलियम और डीजल की कीमत विश्व में सबसे अधिक है जिसे विश्व बैंक ने आंका है। पेट्रोल, विश्व के 160 देशों में से 145 देशों से अधिक मंहगा भारत में बेचा जाता है इसी प्रकार 158 देशों देशों में से 98 देश की तुलना में अधिक मंहगा है। आज विश्व में कूड आयल की कीमतें जुलाई 2014 से नवम्बर 2014 के प्रथम पक्ष वाड़े तक 114 डालर प्रति बेट से 82 डालर तक कम हुई है जिसके कारण विश्व भर में महंगायी में विश्व भर में भारी कमी आयी है इंडोनेशिया में महंगायी की दर 4.5 प्रतिशत जापान में 3.4 प्रतिशत अमेरिका में 2 प्रतिशत इंग्लैण्ड में 1.6 प्रतिशत जर्मनी में 0.8 प्रतिशत इटली में 0.3 प्रतिशत एशियन फैडरेशन से यह 7.4 प्रतिशत है जो भारत की 7.2 प्रतिशत की तुलना में अधिक/चीन की महंगायी दर भी 2.3 प्रतिशत तक नीचे आयी है।
भारत में सितम्बर 2014 में मंहगायी की दर सरकारी दावों के अनुसार 6.5 प्रतिशत कहीं जम रही है। परन्तु देश में फल 22.4 प्रतिशत बढें हैं, दूध 11 प्रतिशत मसाले 8.6 प्रतिशत सब्जियों 8.6 प्रतिशत दाले 7.2 प्रतिशत और अनाज 6.4 प्रतिशत देश यह मंहगायी का ही सैन्सर है जो स्वदेशी पूंजी को प्रोत्साहित नहीं होने दे रहा है। देश में सरकार ने 2005-06 से लगभग 600 स्वशेष आर्थिक क्षेत्रों के निर्माण की स्वीकृति दे रखी है परन्तु अभी तक केवल 170 क्षेत्र ही कार्यरत है। देश में हम क्षेत्रों के लिये आयात निर्यात में सुविधा हैं, करों की छूट की सुविधा है कोड़ियों के मूल्य पर जमीन की उपलब्धी की सुविधा है, किन्तु फिर भी सरकार की यह योजना सफल नहीं है, क्योंकि निवेश का वातावरण देश में नहीं। सरकार की ओर से औद्योगिक पार्क, केरीडोरो की योजना घोषित होती है परन्तु इनको मूर्तरुप नहीं मिल रहा है पर ये योजनायें आज कुछ लोगों की जेब गरम करने के सीखने बन कर रह गयी है।
देश के व्यवस्थापकों द्वारा विकास के लिये विदेशी पूंजी निवेश को ही अग्रदूत माना जा रहा है पर जमीनी हकीकत तो यह है कि विदेशी पंूजी तो देश की सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1 प्रतिशत से 2 प्रतिशत तक ही हैं। यह विकास का ईंधन नहीं हो सकती इस का लाभ केवल इतना ही है कि इसके सहारे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रवेश के सुविधा होती है तथा विदेशी तकनीक को उपयोग में लाने का आवास मिल सकता हैं। विदेशी तकनीक भारत जैसे बहु आबादी वाले तथा परम्परागत उद्योगों के धनी देश के लिये विकास हेतु अकिचन सहायक तो हो सकती है वरन् उसके बल पर देश को समुचित, संतुलित व सर्वांगीण विकास से लाभान्वित नहीं किया जा सकता है। देश में सम्पन्नता और समृद्धि के लिये तो देश को घरेलू पंूजी और उपलब्ध प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के विकास और उनके समय के उपयोग पर ही निर्भर होना होगा।
आज भी भारत में घरेलू बचत राशि जी.डी.पी. का 30 प्रतिशत है एक समय यह 37 प्रतिशत तक होती रही हैं मंहगायी की मार ने इसे संकुचित कर दिया है। श्री आर बैद्यनाथन के अनुसार देश में निजी कोरपोरेट सेक्टर का जी.डी.पी. में अंशदान 18 प्रतिशत मात्र है जबकि गैर कोरपोरटर सेक्टर की भागीदारी 45 प्रतिशत तक है निर्माण-कार्य में यह 64.6 प्रतिशत व्यापार होटल में 74.2 प्रतिशत रेलवे को अलग कर यातायात क्षेत्र में 81.4 प्रतिशत है। गत दो दशकों से सेवा क्षेत्र ही देश के विकास का अग्रदूत रहा है। देश में दो तिहाई विकास, गैर कारपोरेट सेक्टर की ही देन है।
विदेशी पंूजी व बड़े घरानों की पंूजी अनेक दृश्य और अदृश्य कारणों से आकर्षण का केन्द्र प्रशासनिक और राजनैतिक क्षेत्रों का है परन्तु जमीनी हकीकत तो कुछ और ही बयान करती हैं। जब तक स्वदेशी पंूजी निवेशक देश के विकास में पंूजी निवेश हेतु सोच नहीं लेगें विदेशीयों की सोच कदापि सम्भव नहीं। चीन के राष्ट्रपति जी के आज मत के पूर्व 100 विलि0 डालर पूंजी निवेश का भरोसा प्राप्त हुआ था परन्तु जब इस पर अमल हुआ तो 20 विलि0 डालर पर बात आकर सिमट गयी इकोनोमिक फ्रीडम आॅफ दि स्टेट आॅफ इंडिया के रुप में वार्षिक रिपोर्ट जो फ्रेडरिश न्यूओमन इन्स्ट्ीटूट व कटो इंस्टीटूट ने प्रकाशित की के अनुसार 2010-2011 में जो विदेशी पंूजी निवेश के लिये मेमोरेन्डस आॅफ अन्डर स्टेडियम हस्ताक्षर हुए उनमें उल्लखित पंूजी का मात्र 3 प्रतिशत ही वास्तविक में अमल में आया जो बिहार राज्यों में न्यूनतम था और 18.4 प्रतिशत हरियाणा में गुजरात में भी यह 8.5 प्रतिशत ही था। इसी प्रकार एक अन्य आंकलन के अनुसार अगस्त 1999 से जुलाई 2014 तक विदेशी पंूजी निवेश के लिये किये गये वायदों में से बिहार व झारखण्ड में 1 प्रतिशत गुजरात में 13 प्रतिशत और हरियाणा में 19 प्रतिशत ही अमल में आये। इससे स्पष्ट है कि देश के विकास एक रथ विदेशी पूंजी के घोड़ों के सहारे नहीं दौड़ सकता।
प्रधान मंत्री जी औरऐशियान एकोनोमिक रिसर्च का कहना है कि देश में मेक इन इंडिया की गूंज के बावजूद औद्योगिक गतिविधियाँ धीमी है, नयी मांग सुस्त है, कच्चेमाल की कीमतें में तेजी है, तैयार उत्पाद का उठान कम है। विश्व के 189 देशों में भारत का स्थान 134वें पायदान पर है जहाँ व्यापार 25 रुपये करने दश में श्रम अंकुशल है। दश में कुल गे्रजुएट में से 30 प्रतिशत नवयुवक ही कार्य दक्षता में सक्षम पाये जा रहे है। शिक्षा आज अक्षर ज्ञान का साधन बन कर रह गयी है उसका जीवन यापन से कोई लेना देना नहीं रहा। जीरो डिफेक्ट और जीरो ऐफेक्ट उद्योग तो तभी सिरे चढ़ेगा जब वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था और प्रणाली को कारगार रुप दिया जाय। इसके बल पर समाज में संस्कारी नवयुवक पैदा होगे जो जीवन की किसी भी सुझावत से बचा कर खींच पाये में समर्थ बनेंगे। पूंजी देश में मंहगी हो चुकी है नयी पंूजी सृजन में मंहगायी की भार सबसे बड़ा रोड़ा हैं। बैंकों में जमा राशि पर ब्याज दर कम और मंहगायी की वृद्वि दर अधिक रहने से भारतीय मुद्रा की वास्तविक बुद्धमति दिन पर दिन क्षीण होती जा रही है। भारत के प्रति ब्याज की आय 1505 डालर प्रति वर्ष है जो अमेरिका की 53,101 डालर जर्मनी की 44,999 फ्रान्स की 43,000 जापान की 38,491 और चीन की 6747 डालर प्रति वर्ष। देश के उत्पादन क्षेत्र के लिये योजना निर्धारित करते समय उपरोक्त समस्याओं के समाधान खोज में होगें, इन जटिलताओं को उखाड़ फेंकना होगा, तभी मेक इन इंडिया का सपाना भी साकार सम्भव है। देश मे देश की दक्षता, क्षमता, सामर्थ और आवश्यकता के आधार पर स्वप्न सजोने होगे।
लेखक शरद गोयल ‘विचार परिक्रमा’ पत्रिका के सम्पादक है।




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