राह आसान नहीं ’’आप’’ की

Updated: May 31, 2025
हाल ही में चार राज्योेे के विधान सभा चुनावों के जो नतीजे आयें उन्होंने, विशेषता दिल्ली के नतीजो ने सारे देश के राजरीतिक धुरंधरो व समीक्षकों को न केवल अचम्भित कर दिया है, बल्कि उनके होशों हवाश उड़ा दिये हैं, मात्र 11 महीने पहले एक जन आन्दोलन से पैदा हयी एक राजनीतिक पार्टी देश की राजधानी में अपना इतना बडा जनाधार बना चुुकी है। इसकी किसी ने कल्पना भी नही की थी, और सबसे ज्यादा चैकाने वाली बात तो यह है कि इस आम अदामी पार्टी के शीर्ष लोगो में कोई भी पुरानी राजनीतिक परिवेश का नहीं है, समाज के भिन्न-भिन्न वर्ग से आये लोगों ने जिस आम आदमी पार्टी का निर्माण किया और जितने कम समय में किया वह न केवल देश के शियाशतदानों और राजनीतिक क्षेत्र में खलबली मचाने के लिए पर्याप्त है. अपितु विश्व भर के वे लोग जो भारत की राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं, उनको काभी कुछ सोचने का मौका दे दिया है।
लेकिन क्या यह आम आदमी पार्टी अपना इसी तरह का प्रदर्शन आगामी लोक सभा चुनावों में भी दिखा पायेगी या यह दिल्ली तक ही सीमित रह पायेगी, बहुत सारे सवाल आम मतदाता के जेहन में आते हैं, कहीं पार्टी के अन्र्तराज्य होने के बाद वह सब कमियां पार्टी के लोगों में और पार्टी के जनप्रति निधियों में तो नही आ जायेगी जो अन्य राजनीतिक पार्टियों और उनके प्रतिनिधियों में है, यदि इतिहास में झांककर देखें, तो भारतीय राजनीति में इस तरह के चमत्कार होते रहते हैं, पूर्वाेत्तर के कई राज्यों में और दक्षिण के कई राज्यों मेे इस तरह के परिणाम आये है, दक्षिण के राज्य इस बात का बड़े गवाह हैं, कि जब भी वहाँ पर किसी नयी पार्टी का उदय होता है तो प्रचूर मात्रा में जन समर्थन उसको मिलता है, और विशेषता उस पार्टी का मुखिया कोई फिल्मस्टार हो तो, इसी प्रकार असम में भी एक आंन्दोलन को लेकर विद्यार्थी संघ के लोगों को भी एकवाद वहाँ के लोगो ने सरकार सौपीं, लेकिन मतदाताओे को बहुत समय तक नही लुभा पायें।
यदि दिल्ली की तुलना देश के अन्य राज्यों से करे तो दिल्ली का समीकरण देश के बाकी सभी राज्योे से भिन्न है, पूर्वी देश के भिन्न भिन्न जातियों भिन्न-2 राज्यो से आये लोग दिल्ली मे बसते हैं, और उन सभी को सोच भी बाकी राज्यों की तुलना में अलग है। लेकिन आम आदमी पार्टी के प्रर्दशन को हल्के में नही लिया जा सकता है। और आवश्यकता सभी पुरानी राजनीतिक पार्टियों के धुरान्धरो का कि कहींे या बदलाव की आहट तो नही है। आम आदमी पार्टी के मुखियों को भी यह ध्यान रखना होगा कि अपने कार्यकर्तााओं और विधायकों को अनुशासन में रख सकें क्योकि अतीत में इस तरह के भी उदरहरण मिले हैं कि नयी-2 पार्टियों के लोग नयी-2 सत्ता प्राप्त करने के बाद अपना संयम खो देते हैं। बल्कि मेरा मानना है कि सत्ता प्राप्ति के बाद या ताकत मिलने के बाद पहले से ज्यादा अनुशासन मे रहने की आवश्यकता हैं।
भारतीय जनता पार्टी का इतिहास बताता है कि कभी यह च्ंतजल ूपजी जीम कमििमदबम के नाम से जानी जाती थी और जहाँ कहीं भी इस पार्टी की सरकार थी उनके विधायक अनुशासन मे रहने के लिए जाने जाते थे, लेकिन जैसे -2 पार्टी का जनाधार बढ़ा वैसे-2 पार्टी के कार्यकर्ताओं, विधायकों संसदों और मुख्यमंत्रियों पर वह सभी आरोप लगाने लगे जो कि सामान्यता काँगे्रंस के लोगो पर लगते है। इसलिए इस समय सबसे ज्यादा आवयश्कता है कि आम आदमी पार्टी को अपने कार्य कर्ताओ को संगठित व अनुशासित तरीके से रखने की और भविष्य में पार्टी विस्तार के चक्कर में कहीं उन लोगो को भी अपने यहाँ स्थान न दे दें, जिनके कारण से पार्टी की छवि पर कोई आंच आये क्यों कि एक राज्य में विजय प्राप्त करना और देश भर में अपने अस्तित्व को कायम करना दोनों अलग-2 बाते हैं। अभी के परिणामों से उत्साह वर्धक होने की आवश्यकता तो है, लेकिन सम्भलकर चलने की बहुत आवश्यकता है क्यों कि सामने जो लोग है , वो राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं और अपने हाथ से सत्ता निकलते देख शाम, दाम, दण्ड, भेद हर तरह के हथकण्डों का इस्तेमाल कर सकते हैं।




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